पिछले श्लोकों में, कृष्ण ने बताया कि ‘सत्’ और ‘असत्’ क्या हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ‘माया’ क्या है और ‘सत्य’ क्या है। उन्होंने आगे बताया कि शरीर ‘माया’ या ‘असत्’ है, और आत्मा ‘सत्’ या ‘सत्य’ है। श्लोक 19 से, भगवान आत्मा की मुख्य विशेषताओं या मूल स्वभाव का वर्णन करना आरम्भ करते हैं। वह समझाते हैं कि आत्मा किन कारणों से भौतिकता से परे होती है और उसे मारा क्यों नहीं जा सकता। इस लेख में, हम जानेंगे कि हमें ये क्यों पता होना चाहिए कि आत्मा अमर है। हम समझेंगे कि निर्दोष मनुष्यों और जीवों को मारना क्यों गलत है जबकि उनका वास्तविक स्वरूप अर्थात आत्मा तो वैसे भी नहीं मरता। हम यह भी समझेंगे कि हमें अधर्मियों (निर्दोषों पर अत्याचार करने वालों) को आज़ादी से क्यों जीने नहीं देना चाहिए, जबकि हम उनके भी वास्तविक स्वरूप अर्थात आत्मा को तो मार ही नहीं सकते। आइए, भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 19, 20 और 21 के मूल संस्कृत पाठ से शुरुआत करें और फिर उनके हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या की ओर बढ़ें।
भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 19, 20, और 21:
नीचे संस्कृत में गीता के श्लोक 2.19, 2.20, और 2.21 दिए गए हैं, साथ ही उनका हिंदी अनुवाद भी है।
संस्कृत श्लोक:
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते। ।। 19।।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय: |
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे || 20||
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || 21||
हिंदी अनुवाद:
जो इसे मारने वाला समझता है और जो इसे मरने वाला समझता है, वे दोनों ही [इसके सत्य को] नहीं जानते कि इसे न तो मारा जा सकता है और न ही यह किसी को मारता है। ।। 19।।
यह (आत्मा) न जन्म लेती है न मरती है। यह न ही कभी [पैदा] हो चुकी होती है, न [पैदा] हो रही होती है, और न ही [पैदा] होने वाली होती है। यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है, और प्राचीन है। यह शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। ।। 20 ।।
हे पार्थ! जो यह जानता है कि यह (आत्मा) अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय है, वह पुरुष (पुरुष का तात्पर्य जीवात्मा से है न कि लिंग से, इसके अंतर्गत स्त्रियां भी आती हैं) किसे मार सकता है और किसकी मृत्यु का कारण बन सकता है? ।। 21 ।।
व्याख्या, वास्तविक मर्म, और शिक्षाएं
श्लोक 19 के ज़रिए, कृष्ण अर्जुन जैसे संवेदनशील और नैतिकता के साथ जीवन जीने वाले लोगों को संबोधित कर रहे हैं। वह उन्हें भी संबोधित कर रहे हैं जो अक्सर बुराई और पापियों के ख़िलाफ़ लड़ने से ये सोचकर बचते हैं कि पापी भी इंसान ही हैं। वह उन्हें भी संबोधित कर रहे हैं जो सिर्फ इसलिए अधर्मियों के अंत के लिए नहीं लड़ते कि कहीं उन्हें हत्यारा न कहा जाने लग जाये। भगवान चाहते हैं कि इस तरह के लोग यह बात समझें कि वे किसी को पूरी तरह से मार नहीं सकते क्योंकि कोई भी सिर्फ़ शरीर नहीं होता है। हर कोई शरीर और आत्मा का मेल है, और आत्मा ही असली जीवन है, जबकि शरीर उस जीवन का दृश्य रूप है। इंसान सिर्फ़ उस दृश्य रूप को नष्ट कर सकता है, असली जीवन को नहीं। सिर्फ़ इंसान ही नहीं, बल्कि कोई भी चीज़ वास्तविक जीवन (आत्मा) को नहीं मार सकती; वह सिर्फ़ उस जीवन के दृश्य रूप को ही ख़त्म कर सकती है।

आत्मा अमर है, उसे नष्ट नहीं किया जा सकता, मृत्यु सिर्फ शरीर की होती हैअगले दो श्लोकों में, श्री कृष्ण व्यक्ति के असली स्वरूप—यानी आत्मा—के अस्तित्व के बारे में और स्पष्टता देते हैं। वह विस्तार से बताते हैं कि किसी के भी असली स्वरूप (आत्मा) को इसलिए नहीं मारा जा सकता, क्योंकि:
- आत्मा का कभी जन्म नहीं हुआ।
- किसी भी आत्मा का इस समय भी जन्म नहीं हो रहा है।
- किसी भी आत्मा का भविष्य में भी कभी जन्म नहीं होगा।
- आज तक कोई भी आत्मा कभी नहीं मरी।
- शरीर के मरने या नष्ट होने पर कोई भी आत्मा खत्म नहीं हुई।
- हर आत्मा अजन्मी, शाश्वत, अनंत, पुरातन, और अव्यय है।
इन तथ्यों के द्वारा कृष्ण अर्जुन और दूसरे मनुष्यों को समझाते हैं कि आत्मा हमेशा से अस्तित्व में तो है लेकिन उसने कभी जन्म नहीं लिया। और यह बात सभी जानते हैं कि केवल वही चीज़ें नष्ट हो सकती हैं या खत्म हो सकती हैं जिनका जन्म या उत्पादन हुआ हो। चूँकि आत्मा न तो पैदा हुई है और न ही इसे बनाया गया है, इसलिए उसमें नष्ट होने या खत्म होने का गुण नहीं हो सकता। चूँकि उसमें नष्ट होने या खत्म होने का गुण नहीं है, इसलिए उसे नष्ट करने या खत्म करने की कोई संभावना नहीं है।
इसलिए, जो लोग संवेदनशील, शरीफ, और कोमल स्वभाव के हैं, उन्हें किसी पापी को मारने का अपराध-बोध नहीं होना चाहिए, क्योंकि:
- वे किसी के असली स्वरूप (आत्मा) को नहीं मार सकते। और,
- जो लोग उन्हें हत्यारा कहते हैं, वे अज्ञानी हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि किसी के असली स्वरूप — यानी आत्मा — को मारा नहीं जा सकता।
चूंकि आत्मा को मारा नहीं जा सकता, तो क्या मासूमों को मारने वाले भी दोषी नहीं हैं?
आत्मा को मारा नहीं जा सकता, यह परम सत्य है। इसीलिए, यदि मासूम और निर्दोष लोगों और जीवों की रक्षा करने के लिए अधर्मियों को मारना भी पड़े, तो ऐसा करते हुए मनुष्य को खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए। लेकिन, जब अधर्मी लोग निर्दोष जीवों की हत्या करते हैं, उन पर अत्याचार करते हैं, तब वे आत्मा को न मार पाने की स्थिति में भी दोषी होते हैं। क्यों? क्योंकि शरीर को मारना पाप नहीं है, लेकिन मासूमियत, निरपराधता, सरलता, धर्म (मनुष्य के कर्त्तव्य), सार्वभौमिक न्यायसंगतता, और निर्दोषों के प्रति दयाभाव की हत्या करना पाप है। धार्मिक और अधर्मी, दोनों तरह के लोग आत्मा और शरीर का मिश्रण होते हैं। और, दोनों को ही अपने असली स्वरूप के अनुसार, अर्थात स्वयं को आत्मा जानकर ही व्यवहार करना चाहिए। उन्हें जानना चाहिए कि उन्हें (आत्मा) को शरीर इसलिए दिया गया है ताकि वह कर्म कर सके। उन्हें यह भी जानना चाहिए कि धर्म (ईश्वर की इच्छा) के अनुसार, हर आत्मा के कर्म केवल ईश्वर की सृष्टि के सुचारू संचालन के लिए ही होने चाहिए।
ईश्वर की रचना के सुचारू प्रवाह को सुनिश्चित करने का अर्थ है सभी जीव-जंतुओं को शांति और स्वतंत्रता से जीने देना। इतना ही नहीं, इसका अर्थ यह भी सुनिश्चित करना है कि आने वाली पीढ़ियाँ भी ऐसा ही व्यवहार करें और उनके साथ (इसमें सभी जीव जंतु भी शामिल हैं) भी ऐसा ही व्यव्हार हो। यह कैसे होगा?
- अगली पीढ़ियों को आध्यात्मिकता और सार्वभौमिक कल्याण की अवधारणाओं का प्रशिक्षण देकर, और
- उन शरीरों और संस्थाओं को समाप्त करके जो निर्दोष जीव-जंतुओं के शोषण और हत्या में उपयुक्त प्रमुख संसाधन हैं।
आध्यात्मिकता अगली पीढ़ियों को वह समझदारी प्रदान करेगी जिसका उपयोग करके वे खुद को भौतिक भोग-विलास में लिप्तता और पक्षपात पूर्ण व्यवहार से बचा सकेंगे। और अधार्मिक शरीरों और संस्थाओं को नष्ट करने से भविष्य की पीढ़ियों में अधर्म और भौतिकता पर आधारित पक्षपात के प्रसार को रोका जा सकेगा।
दुनिया में कहीं भी, किसी के भी द्वारा किए जाने वाले सभी गलत कामों की जड़ भौतिकता पर आधारित पक्षपात और उसमे अतिलिप्तता होती है। इसलिए, यह पक्का करना ज़रूरी है कि वे सभी आत्माएं जिनके पास शरीर है, उनका कोई भी कार्य भौतिक पक्षपात पर आधारित न हो। इसके विपरीत उनके द्वारा किये जाने वाले सभी कर्म, सभी जीवों को, पूरी ईमानदारी के साथ, न्याय प्रदान करने की भावना पर आधारित होने चाहिए। और जो लोग सभी मासूम और निर्दोष जीव-जंतुओं की भलाई को ताक पर रखकर, सिर्फ भौतिक पक्षपात के आधार पर कार्य करते हैं, वे ईश्वर की सृष्टि के सुचारू सञ्चालन में बाधा डालने के दोषी होते हैं। इसलिए, जब ऐसे लोग बेगुनाहों की जान लेते हैं, तो वे दोषी बन जाते हैं।
अगर हम ध्यान से देखें, तो पाते हैं कि जो लोग बेगुनाहों (जिसमें मनुष्य और जानवर सभी आते हैं) की हत्या करते हैं, वे ऐसा किसी तरह की भौतिक संतुष्टि पाने के लिए करते हैं। वे ऐसा अपने व्यक्तिगत फ़ायदे, परिवार को मिलने वाले फ़ायदे, मज़हब या रिलिजन को होने वाले फ़ायदे, या इसी तरह के दूसरे फ़ायदों के लिए करते हैं। जब वे इस तरह की सोच के साथ काम करते हैं, तो वे सबके कल्याण की भावना को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यही बात लोगों को पापियों और दोषियों की श्रेणी में लाती है।
इस प्रकार, जो लोग बिना किसी भौतिक स्वार्थ के, सभी जीवों की भलाई के लिए, किसी की हत्या करते हैं, वे दोषी नहीं होते। इसके उलट, जो लोग भौतिक स्वार्थ के कारण और सभी जीवों की भलाई को नज़रअंदाज़ करके किसी की हत्या करते हैं, वे दोषी होते हैं।
आत्मा को मारा नहीं जा सकता—इस कथन का मतलब है कि कोई भी, किसी के भी वास्तविक अस्तित्व का अंत नहीं कर सकता; इसलिए, किसी को (यानी किसी के शरीर को) मारना पाप नहीं है। हालाँकि, अगर आप किसी ऐसे निर्दोष व्यक्ति (शरीर) को मारते हैं जो ईश्वर की सृष्टि अर्थात रचना को आगे बढ़ाने और उसके पापरहित संचालन में योगदान दे रहा है, तो यह निश्चित रूप से पाप या अपराध है। दूसरी ओर, अगर आप किसी को (यानी किसी के शरीर को) मारते हैं और उस हत्या से निर्दोष जीवों की सुरक्षा और भलाई होती है, तो वह हत्या पाप नहीं है।
निष्कर्ष यह है कि इंसानों को इस बात का मुख्य रूप से ध्यान रखना चाहिए कि सभी जीवों के साथ न्याय हो। उनका ध्यान न किसी शरीर को बचाने पर होना चाहिए या न किसी शरीर को मारने पर। उनका कर्त्तव्य वह करना है, जो सभी निर्दोष इंसानों और जानवरों—जिनमें आने वाली पीढ़ियाँ भी शामिल हैं—की भलाई के लिए ज़रूरी हो।
इसलिए, जब कोई अधर्मी व्यक्ति किसी निर्दोष जीव की हत्या करता है, तो वह पापी बन जाता है। लेकिन जब कोई धार्मिक (सभी जीवों का कल्याण करने वाला) व्यक्ति किसी अधर्मी (अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों को कष्ट देने वाले) व्यक्ति की हत्या करता है, तो वह दोषी या पापी नहीं होता।
अधर्मियों को मारना ही क्यों हैं जब उनके वास्तविक अस्तित्व – आत्मा – को मारा ही नहीं जा सकता?
आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि जब किसी व्यक्ति का असली स्वरूप कभी नष्ट ही नहीं होता, तो एक धार्मिक व्यक्ति को अधर्मी (निर्दोषों पर अत्याचार करने वाले व्यक्ति) का वध क्यों करना चाहिए?
ऊपर दो बातों का प्रमुख रूप से ज़िक्र किया गया है।
- कोई भी आत्मा तभी कोई कर्म (चाहे अच्छा हो अच्छा या बुरा) कर सकती है जब उसके पास शरीर हो। शरीर के बिना वह कोई भी कर्म नहीं कर सकती।
- किसी शरीर को खत्म करना पाप नहीं है, लेकिन ईश्वर की रचना के पापरहित सञ्चालन में बाधा डालना पाप है।
इस तरह, जब अच्छे लोग, बुरे (भौतिकता के आधार पर पक्षपात और अत्याचार करने वाले) लोगों को मारते हैं, तो वे कोई पाप नहीं करते। वे बस बुरे कामों को होने से रोकते हैं। कैसे? वे बस आत्माओं को शरीर से अलग कर देते हैं ताकि वे आत्माएँ बुरे काम न कर सकें।
चूंकि अधर्मी लोगों के काम, बेगुनाह जीवों के शांतिपूर्ण जीवनयापन में बाधक होते हैं, वे ईश्वर की रचना अर्थात सृष्टि के प्रवाह में रुकावट बन रहे होते हैं। और ईश्वर की रचना के सुचारू और पापरहित सञ्चालन में बाधा डालना पाप है। इसलिए, धार्मिक लोग उन आत्माओं के शरीर को नष्ट कर देते हैं जो अधार्मिक या बुरे कामों में लगी हुई होती हैं। इस तरह वे अधार्मिक कामों को होने से रोकते हैं। यही विश्व, ब्रह्माण्ड, या ब्रम्हाण्डों में कहीं भी रहने वाले प्रत्येक मनुष्य का असली कर्त्तव्य है।
इसलिए, जब कोई धार्मिक (सभी जीवों का कल्याण करने वाला) इंसान किसी बुरे (कुछ को छोड़कर बाकी सभी जीवों को प्रताड़ित करने वाले) इंसान को मारता है, तो वह धरती पर हर जगह धर्म (सभी मनुष्यों और जानवरों के कल्याण की भावना और वैसे ही कर्म करने की प्रवृत्ति) की स्थापना में योगदान देता हैं। उसका लक्ष्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि उन साधनों को खत्म करना है जो बुरे कार्य करने में प्रयोग किये जा रहे हैं। पापकर्म या अधर्म करने वालों के मामले में, आत्मा को अधार्मिक कृत्य करने में मदद करने वाला प्रमुख साधन उनका शरीर ही होता है। किसी अधर्म करने वाले को मारकर, एक धार्मिक व्यक्ति असल में उस साधन (शरीर) को ही खत्म करता है जिसके द्वारा पापकर्मों को किया जा रहा होता हैं। इसीलिए, आत्मा को न मारे जा सकने के बावजूद भी, पापियों और अधर्मियों को मारना आवश्यक होता है। ऐसा करने के पीछे, धार्मिक लोगों का उद्देश्य पापकर्म करने में इस्तेमाल होने वाले साधनों को छीनना होता है, न कि लोगों की हत्या करना।
मुख्य शिक्षाएं
भगवद्गीता के श्लोक 19, 20 और 21 की व्याख्या करने वाला यह लेख मनुष्यों को निम्नलिखित शिक्षाएं देता है:
- आत्मा अमर और शाश्वत है; इसलिए, मृत्यु का भय और उसके कारण होने वाले शोक को त्याग दें। बस धर्म (सभी जीवों के कल्याण) पर ध्यान केंद्रित रखें!
- आत्मा अजन्मी, अविनाशी और शाश्वत है, लेकिन इस सत्य का दुरूपयोग निर्दोष जीवों की हत्या करने के बहाने के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने पर आप अपने धर्म (सभी जीवों का कल्याण चाहने की प्रवृत्ति) की हत्या करते हैं, जो कि एक पाप है।
- आत्मा अमर है—इस सत्य का दुरूपयोग अधर्मियों को मासूमों की हत्या और उन पर अत्याचार करते रहने देने के बहाने के तौर पर नहीं करना चाहिए। क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं, तो आप समाज के बड़े हिस्से से धर्म (सभी जीवों का भला चाहने की प्रवृत्ति) को खत्म होने देते हैं, और ऐसा करना भी पाप है।
निष्कर्ष
इन श्लोकों से हमें स्पष्टता मिलती है कि आत्मा अजन्मी और अमर है; इसलिए, जो लोग पृथ्वी से धर्म (सभी जीवों के कल्याण की भावना) को मिटाने का काम करते हैं, उनका अंत करने से हमें डरना नहीं चाहिए। यद्यपि आत्मा अविनाशी है, फिर भी निर्दोष जीवों को मारना या उन पर अत्याचार करना उचित नहीं है क्योंकि यह धर्म (सभी जीवों के कल्याण की भावना) के विरुद्ध है, और यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप उसी श्रेणी में आ जाते हैं जिनका अंत करना पाप नहीं है।
आगे के श्लोकों में, कृष्ण आत्मा के असली स्वरूप के बारे में और विस्तार से बता रहे हैं। यह मरती क्यों नहीं है? शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है? क्या दुनिया की कोई चीज़ इसमें परिवर्तन कर सकती है या इसे नष्ट कर सकती है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमारे साथ जुड़े रहिए!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
भगवद्गीता श्लोक 2.20 मृत्यु के बारे में क्या कहता है?
भगवद्गीता का श्लोक 2.20 कहता है कि मृत्यु शरीर (जीव के भौतिक रूप) की होती है, आत्मा (वास्तविक जीव) की नहीं। इसका मतलब है कि मृत्यु होने पर केवल शरीर बदलता है या नष्ट होता है, आत्मा (जीव का वास्तविक स्वरूप) नहीं।
मृत्यु के बाद क्या होता है?
मृत्यु के बाद, आत्मा (जीव का वास्तविक स्वरूप) या तो किसी दूसरे शरीर में प्रवेश करती है या फिर अपने मूल अर्थात ईश्वर के निराकार स्वरूप में वापस विलीन हो जाती है। ऐसी आत्माएँ जिन्होंने शरीर में रहते हुए अपनी इच्छा की पूर्ति के उद्देश्य से साधारण या बुरे कर्म किए हों, वे दूसरे शरीर में प्रवेश करती हैं। इसके विपरीत, वे आत्माएँ जिन्होंने शरीर में रहते हुए, अपने लिए किसी चीज़ की इच्छा किए बिना, धर्म के अनुसार कार्य किया है, वे ईश्वर के निराकार रूप में वापस विलीन हो जाती हैं अर्थात उन्हें मोक्ष मिल जाता है।
क्या देवी या देवता के सामने पशुओं की बलि देना गलत है?
हाँ, किसी देवी या देवता को जानवरों की बलि देना बिलकुल गलत है, क्योंकि जो देवी या देवता है वह आपकी इच्छाएँ पूरी करने के बदले किसी निर्दोष जानवर की जान नहीं मांग सकता। अगर आप उनसे कोई ऐसी चीज़ मांगते हैं जिसके योग्य आप नहीं हैं, तो हो सकता है कि वो आपसे कोई ऐसी चीज़ बलिदान करने को कहें जिसके बिना आप नहीं रह सकते — लेकिन वे कभी किसी निर्दोष जानवर की जान नहीं माँगेंगे। जो आपसे बेगुनाह जानवरों की बलि देने को कहते हैं, वे बुरी शक्तियाँ हैं।
अगर हम विशेष रूप से ईश्वर की बात करें, तो हमें समझना होगा कि सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि हर जीव उसी एक ईश्वर की संतान है, और इसलिए ईश्वर कभी नहीं चाहेंगे कि आप उनकी संतानों को मारें। याद रखें: जो सिर्फ़ कुछ ही लोगों का पिता है, वह ईश्वर नहीं हो सकता। ईश्वर वही है, जो सभी जीवों का पिता है।
जब आत्मा को मारा ही नहीं जा सकता, तो जानवरों को मारने में क्या बुराई है?
यह सच है कि आत्मा को मारा नहीं जा सकता, लेकिन इससे आपका किसी निर्दोष की हत्या करना दोषरहित नहीं हो जाता। किसी शरीर को मारना पाप नहीं है, लेकिन किसी निर्दोष आत्मा से उसका शरीर छीन लेना पाप है, गलत है।
शरीर तो बस आत्मा के लिए दुनिया में कर्म करने का एक साधन है। धर्म के अनुसार, हर आत्मा को शरीर का उपयोग वो कर्म करने में करना चाहिए जिनसे ईश्वर की बनाई सृष्टि सुचारु रूप से चलती रहे। अगर कोई धार्मिक इंसान किसी निर्दोष की रक्षा करने के लिए किसी अधर्मी हमलावर को मारता है, तो वह इसी मकसद की पूर्ति के लिए काम कर रहा होता है। इसके विपरीत, जब आप किसी निर्दोष और बेबस जानवर की हत्या करते हैं तब आप उस मकसद की पूर्ति के विरुद्ध काम कर रहे होते हैं। ऐसा करके आप सृष्टि के उस भाग, जो उस जानवर के रूप में जाना जाता है, के सुचारु जीवनयापन में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसा करके आप मानव धर्म, सार्वभौमिक न्याय, और दया की भावना की हत्या कर रहे हैं।
इस प्रकार, सिर्फ किसी की जान लेना अपराध नहीं होता, क्योंकि आत्मा तो वैसे भी नहीं मरती। लेकिन किसी निर्दोष की जान अपने मज़े या स्वार्थ के लिए ले लेना, उस मकसद के साथ धोखा है, जिसकी पूर्ति के लिए आत्मा को शरीर दिया गया था। और इसीलिए निर्दोष जानवरों को मारना बिलकुल गलत है, राक्षसी है।
क्या आत्मा की अमरता या शाश्वतता को स्वीकार करने से जीवन का महत्व कम हो जाता है?
नहीं, यह जान लेने या मान लेने से, कि आत्मा अमर है, जीवन का महत्व कम नहीं होता, बल्कि इससे डर, लालच, अहंकार, मोह और मनुष्य के चरित्र के दुसरे विकारों का महत्व कम हो जाता है। जब मनुष्य के जीवन में इन विकारों का महत्व कम हो जाता है, तो वह इनके प्रभाव में आकर काम करना बंद कर देता है और सोच समझ कर बुद्धिमानी से काम करने लगता है। जब वह बुद्धिमानी से काम करने लगता है तब वह ऐसा कुछ नहीं करता जो किसी भी जीव के लिए कष्टप्रद या गलत हो। और जब ऐसा होता है, तो वह एक बेहतर इंसान बन जाता है।
क्या किसी को सच में मारा जा सकता है?
हाँ, लोगों की जान ली जा सकती है, लेकिन इससे उनका अस्तित्व खत्म नहीं होता; क्योंकि मृत्यु सिर्फ शरीर की होती है, जबकि उस शरीर को धारण करने वाला (आत्मा) हमेशा अस्तित्व में रहता है।
आत्मा के होने का क्या प्रमाण है?
आत्मा के होने का सबूत मृत शरीर का ध्यान से निरीक्षण करने से मिलता है। अगर आप ध्यान से देखें और चिंतन करें, तो आप पाएंगे कि मृत्यु के समय शरीर से कोई भी भौतिक चीज़ बाहर नहीं निकलती। मृत्यु के तुरंत बाद, शरीर का हर अंग वैसा ही रहता है जैसा मौत से ठीक पहले था—चाहे वह दिल हो, खून हो, फेफड़े हों या कुछ और। फिर भी शरीर सांस लेना बंद कर देता है क्योंकि कोई अदृश्य चीज़ शरीर से निकल जाती है, और वही आत्मा है।












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