सत्, असत्, माया, और तत्वदर्शी का अर्थ – भगवद् गीता, अध्याय 2, श्लोक 16 से 18

एक सांकेतिक चित्र जिसमें मानव शरीर कणों में विलीन हो रहा है और भीतर से एक शाश्वत ज्योतिर्मय आत्मा चमक रही है; पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण अर्जुन को ज्ञान दे रहे हैं। ये सभी मिलकर माया, सत्य, नश्वर शरीर, और अविनाशी आत्मा को दर्शाते हैं।
सत् स्थायी है, असत् नहीं। आत्मा स्थायी है, शरीर नहीं। तत्वदर्शी इन दोनों के प्रत्येक पहलू को जानते हैं।

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 16, 17 और 18 हमें एक सार्वभौमिक सिद्धांत के बारे में बताते हैं कि “सत्य (सत्) के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता”। ये श्लोक यह भी बताते हैं कि असत्य (असत्) कभी भी हमेशा के लिए कायम नहीं रह सकता क्योंकि उसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता। इन श्लोकों में उन लोगों के आंतरिक चरित्र या गुणों की चर्चा की गई है जो सत्य और असत्य के बीच के अंतर को पहचान सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि दोनों की अंतिम गति क्या होने वाली है। ये श्लोक बताते हैं कि यदि मनुष्य उस अविनाशी तत्व को जान ले, जिसके कारण इस भौतिक संसार में हर चीज़ का अस्तित्व है तो वह उन चरित्रक गुणों को स्वयं में विकसित कर सकता है। ये श्लोक उस अविनाशी तत्व और भौतिक शरीरों के बीच के मुख्य अंतर के बारे में भी बताते हैं, क्योंकि यदि मनुष्य उस अंतर को जान ले तो वह उस मूल और पूर्ण तत्व को आसानी से जान सकता है।

यह लेख माया (असत्) और सत् के अर्थ को समझाते हुए इन श्लोकों के हर पहलू का गहन विश्लेषण करता है। यह समझाता है कि सत् क्यों स्थायी है और असत् क्यों स्थायी नहीं है। यह ‘तत्त्वदर्शियों’ के अर्थ की भी गहराई से व्याख्या करता है। साथ ही, यह उस मूल तत्व का वर्णन करता है जो सभी भौतिक वस्तुओं और पहलुओं के अस्तित्व का आधार है। इस लेख में यह भी बताया गया है कि वह मूल तत्व अविनाशी क्यों है। इसमें हमने यह भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि उस तत्व का ज्ञान व्यक्ति को ‘तत्त्वदर्शी’ क्यों बनाता है। तो आइए, गीता के श्लोक 2.16, 2.17 और 2.18 की दुनिया में अपनी यात्रा इनके मूल संस्कृत रूप से शुरू करते हैं।

भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 16, 17, और 18

नीचे संस्कृत में गीता के श्लोक 2.16, 2.17, और 2.15 दिए गए हैं, साथ ही उनका हिंदी अनुवाद भी है।

संस्कृत श्लोक

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।। 16।।

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ 17 ॥

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥ 18॥ 

हिंदी अनुवाद:

असत् (अधर्म, माया, नश्वर चीज़ों आदि) का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है, और सत् (धर्म, सत्य, नित्य, आदि) का कभी अभाव या अनस्तित्व नहीं होता। [जिन लोगों ने परम ज्ञान प्राप्त कर लिया है, अपने मन को शुद्ध कर लिया है, और जो वास्तविकता के सार को समझते हैं, अर्थात] जो तत्वदर्शी हैं वे स्पष्ट रूप से देख पाते हैं कि इन दोनों का अंतिम स्वरुप क्या होता है।। 16।। यह बात जानो कि अविनाशी सिर्फ वह है, जिससे यह संपूर्ण जगत (कहीं भी मौजूद कोई भी भौतिक वस्तु) व्याप्त है। कोई भी इस शाश्वत तत्व (आत्मा और ईश्वर; यहाँ संदर्भ आत्मा का है) को नष्ट करने में सक्षम नहीं है।। 17।। केवल यह शरीर ही है जो नष्ट हो सकता है; इस शरीर को धारण करने वाला (आत्मा—जो वास्तविक तुम और वे हैं) अविनाशी है, वह असीम है (उन समस्त वस्तुओं से परे है जो भौतिक हैं)। इसलिए, हे भारत (अर्जुन)! तुम बस युद्ध करो ।। 18।।

व्याख्या, वास्तविक मर्म, और शिक्षाएं

भगवद्गीता के इन श्लोकों में श्री कृष्ण ने माया और सत्य की व्याख्या की है।

  • माया – वह सब कुछ जो अस्थायी है और जिसका बदलना या ख़त्म होना तय है।
  • सत्य – वह जो सभी परिस्थितियों और स्थितियों में स्थायी और निरपेक्ष है।

उन्होंने कहा:

  • असत् स्थायी नहीं है।
  • सत् का अंत नहीं किया जा सकता।
  • तत्वदर्शी ‘सत्’ और ‘असत्’ — दोनों की अंतिम गति को जानता है।
  • केवल शरीर ही नष्ट हो सकता है, उस शरीर को धारण करने वाला—अर्थात् आत्मा—नहीं।
  • आत्मा अमापनीय है, जिसका अर्थ है कि वह भौतिक नहीं है।

इन कथनों और श्लोकों में छिपे हुए सार को समझने के लिए, हमें प्रत्येक शब्द का वास्तविक अर्थ समझना होगा। आइए, एक-एक करके इनकी गहराई में उतरने का प्रयास करते हैं।

माया क्या है?

माया वह सब कुछ है जो, अस्थायी होते हुए भी, जीवन या अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रतीत होती है। इसमें वे सभी वस्तुएँ, भावनाएँ, विचार और भौतिक जगत से जुड़ा हर पहलू शामिल है, जो सार्वभौमिक न्यायसंगतता और सर्व-जन-जीव हिताय की संकल्पना की उपेक्षा करने के लिए प्रेरित या मज़बूर करता है और मनुष्य को स्वार्थी और एक-तरफ़ा सोच रखने वाला बनाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप हर उस चीज़ से नफ़रत करने लगेंगे जो भौतिक है या किसी द्रव्य (पदार्थ) से जुड़ी हुई है। आपको बस उनका उपयोग या उपभोग करते हुए उनमे लिप्त या आसक्त नहीं होना है। आपको समझना है कि इन भौतिक पदार्थों का मनुष्यों और दुसरे सभी जीवों के कल्याण में क्या उपयोग है, और उसके आधार पर ही, उस जीव, वस्तु आदि में और उसके परिणाम में आसक्त रहित होकर, उसका उपयोग करना है। इसके विपरीत, यदि आप अपने आस-पास की भौतिक चीज़ों के होने के पीछे के वास्तविक उद्देश्य को समझना और पहचानना नहीं सीखते हैं, और एकतरफा सोच रखते हुए या स्वार्थी होकर, उसमे आसक्त होकर, सिर्फ उसी के लिये जीने लग जाते हैं, तो वह सब ‘माया’ बन जाती हैं। याद रखें, ‘धर्म’ की तरह ही, माया भी अपनी मूल अवधारणा को यथावत रखते हुए, भौतिक रूप से परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। 

यदि आप किसी भी भौतिक वस्तु, विचार, भाव आदि के सत्य को नहीं जानते हैं, या फिर जानते हुए भी उसके सत्य को नज़रंदाज़ करते रहते हैं, और उसे कुछ और ही मान कर कर्म करते रहते हैं, तो वह वस्तु, विचार, भाव, आदि सब कुछ  ‘माया’ बन जाती है। आइए, इसे धन के एक उदाहरण से समझते हैं।

हम सभी जानते हैं कि धन या पैसा एक ऐसा साधन है जिसके ज़रिए हम अपनी ज़रूरत की चीज़ों का लेन-देन कर पाते हैं। लेकिन, बहुत से लोगों का पैसों (धन) के बारे में एक अलग ही नज़रिया है। कुछ लोग इसे ही सफलता मानकर चलते हैं, तो कुछ इसे ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानकर चलते हैं। और इसीलिए, वे लोग पैसों (धन) के गुलाम बनते जा रहे हैं। सभी भौतिक चीज़ें हमारे उपयोग के लिए हैं, न कि सिर्फ उनमें ही फँसकर रह जाने के लिए। जब ​​आप किसी भी भौतिक चीज़, विचार या भावना में इस तरह फँस जाते हैं कि उसे ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य या नियम बना लेते हैं, तो वह वस्तु, विचार, भाव, आदि सब कुछ ‘माया’ बन जाती है। लेकिन, अगर आप उस चीज़, विचार या भावना का इस्तेमाल केवल वहीं करते हैं जहाँ उसका सृष्टि के सभी शुद्ध पहलुओं पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ना हो, तो फिर वह ‘माया’ नहीं रह जाती।

सत्य क्या है?

‘सत्य’ दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है – ‘सत्’ और ‘य’। ‘सत्’ का अर्थ है सही, शुद्ध या पवित्र, और ‘य’ का अर्थ है ‘जो’। इस प्रकार, सत्य वह है जो सही, शुद्ध और पवित्र है – न केवल प्राणियों के किसी छोटे समूह के लिए, बल्कि सार्वभौमिक रूप से। यह वो है, जिसके न होने पर कोई भी और कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता। यहाँ तक कि ‘माया’, ‘असत्य’ या ‘बुराई’ भी सत्य की उपस्थिति के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते। आइए, इसे महाभारत के एक उदाहरण से समझते हैं।

महाभारत में, कर्ण ने कौरवों के साथ मिलकर निहत्थे अभिमन्यु को मार डाला था, जो कि युद्ध के नैतिक नियमों के विरुद्ध था। यद्यपि अभिमन्यु को मारते समय कौरवों ने युद्ध के नैतिक नियमों की कोई परवाह नहीं की थी, फिर भी वे चाहते थे कि उस युद्ध में पांडव उन नैतिक नियमों का पालन करें। जब अर्जुन ने निहत्थे कर्ण को मारा, तो उन्होंने अर्जुन पर अधर्म करने का आरोप लगाया। जब ​​भीम ने दुर्योधन की कमर के नीचे प्रहार किया, तो उन्होंने भीम पर धर्म के विरुद्ध जाने का आरोप लगाया। जब ​​युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य की मृत्यु को आसान बनाने के लिए अश्वत्थामा की मृत्यु का छलपूर्ण संदेश दिया, तो उन्होंने युधिष्ठिर पर सवाल उठाए। क्यों? क्योंकि वे चाहते थे कि पांडव युद्ध के नैतिक नियमों का पालन करें। और वे ऐसा इसलिए चाहते थे क्योंकि कौरव सेना के वे अधर्मी सैनिक तभी जीवित रह पाते, जब पांडव युद्ध के धर्मसम्मत नियमों का पालन करते।

इस प्रकार कृष्ण का ‘सत् का अभाव नहीं होता है’ वाला कथन पूर्ण सत्य सिद्ध होता है क्योंकि असत् या अधर्म या अधर्मी के अस्तित्व में रहने के लिए भी सत् की आवश्यकता पड़ती है।  

असत् हमेशा के लिए अस्तित्व में नहीं रह सकता।

‘असत्’ का अर्थ है ‘माया’, जिसके बारे में हम ऊपर पहले ही चर्चा कर चुके हैं। जब भगवान ने अर्जुन से कहा कि ‘असत्’ स्थायी नहीं है, तो उनका आशय मानव शरीर, रिश्तों और अर्द्ध-स्थायी कर्तव्यों (अर्द्धस्थायी कर्तव्यों को समझने के लिए धर्म वाला पेज देखें) के प्रति आसक्ति मिटाने से था। उन्होंने इनका सत्य समझाने के लिए निम्नलिखित बातें कहीं:

  • ये चीज़ें, नियम, और भावनाएं सार्वभौमिक नहीं हैं।
  • ये ‘सत्य’ नहीं, बल्कि ‘माया’ है।
  • ये आपको सिर्फ परम सत्य जैसे प्रतीत होते हैं, पर हैं नहीं।
  • ये वे पहलू हैं जो समय के साथ बदलते रहते हैं।
  • इसलिए, आपको इनमे ज्यादा आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।

आइए, इसे द्रोणाचार्य के उदाहरण से समझते हैं।

कृष्ण के उपर्युक्त कथनों के अनुसार, द्रोणाचार्य—जिनके लिए अर्जुन बहुत ज़्यादा चिंतित थे—’असत्’ अर्थात ‘माया’ थे। श्री कृष्ण ने उन्हें यह समझाया कि द्रोण का भौतिक अस्तित्व स्थायी नहीं है, बल्कि उनका अदृश्य (आत्मा) अस्तित्व स्थायी है। उन्होंने समझाया कि द्रोणाचार्य का वह रूप जिसे अर्जुन देख पा रहे थे और जिसके लिए वह चिंतित थे, वह ‘असत्’ (अस्थायी या माया) था। इसके विपरीत, द्रोणाचार्य का वह रूप जिसे अर्जुन नहीं देख सकते थे, वह द्रोणाचार्य नामक शरीर के भीतर स्थित ‘आत्मा’ थी। वही ‘सत्’ अर्थात स्थायी था, और वही द्रोणाचार्य का वास्तविक अस्तित्व था। इसलिए, द्रोणाचार्य और अन्य लोगों के भौतिक रूप की रक्षा करने के लिए, बुराई से युद्ध करने से बचने का अर्जुन का तर्क भी ‘सत्’ अर्थात सही नहीं था, क्योंकि वे भौतिक रूप, वैसे भी, हमेशा अस्तित्व में रहने वाले नहीं थे। इसके विपरीत, उनके वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को न तो नुकसान पहुंचाया जा सकता था और न ही नष्ट किया जा सकता था। तो फिर, उनकी शारीरिक मृत्यु से भयभीत होने का कोई औचित्य ही नहीं था।

निष्कर्षतः, बिना किसी के अस्तित्व की चिंता किए, सही के लिए और बुराई के विरुद्ध युद्ध करना ही बेहतर है, क्योंकि उनका शारीरिक अस्तित्व वैसे भी हमेशा नहीं रहेगा, और उनके वास्तविक अस्तित्व अर्थात आत्मा को किसी भी युक्ति या शस्त्र से मिटाया या ख़त्म किया नहीं जा सकता।

‘सत्’ को खत्म नहीं किया जा सकता।

जैसा कि ऊपर बताया गया है, गीता के इन श्लोकों में ‘सत्’ को  समस्त जीवों के वास्तविक अस्तित्व के सन्दर्भ में प्रयोग किया गया है। वह वास्तविक अस्तित्व अलग अलग शरीरों के भीतर रहने वाली आत्मा ही है। और, आत्मा को मारना, उसे हानि पहुँचाना या उसका अंत करना असंभव है। किसी भी प्रकार की हानि सिर्फ शरीर को पहुँचाई जा सकती है, न कि आत्मा को। शरीर को मृत तब कहा जाता है, जब आत्मा उससे अलग हो जाती है। उसे मृत मानने के लिए आत्मा की मृत्यु होने का इंतज़ार नहीं किया जाता।

तत्वदर्शी ‘सत्’ और ‘असत्’ — दोनों की अंतिम गति को जानते हैं।

‘तत्व’ एक संस्कृत-हिंदी शब्द है। तत्व वह है जिससे कोई भी वस्तु बनती है। आवर्त सारणी, जिसके बारे में स्कूलों में रसायन विज्ञान की कक्षाओं में पढ़ाया जाता है, जो लोग उसके बारे में जानते हैं, वे तत्व को और भी बेहतर ढंग से समझ पाएँगे। आवर्त सारणी एक ऐसी सारणी है, जिसमें उन सभी तत्वों को सूचीबद्ध किया गया है जिनकी पहचान रासायनिक वैज्ञानिक कर चुके हैं। वर्तमान में इन तत्वों की संख्या 118 है, जो हाइड्रोजन से शुरू होकर ओगनेसन तक जाती है।

जब भी भौतिक और रासायनिक वैज्ञानिक किसी भी चीज़ की मूल विशेषताओं और/या उसके उपयोग के बारे में जानना चाहते हैं, तो वे उन तत्वों का अध्ययन करते हैं जिनसे वह चीज़ बनी होती है। इसी तरह, आध्यात्मिक वैज्ञानिक हर भौतिक और अभौतिक चीज़ का अध्ययन करते हैं, ताकि वे चीज़ों और लोगों के मूल गुणों, उनके उपयोग और/या उद्देश्य को जान सकें। वे हमेशा उस तत्व की खोज में रहते हैं, जो हर चीज़ और हर किसी के अस्तित्व का मूल है। गहन शोध और अध्ययन के बाद, कई आध्यात्मिक वैज्ञानिक हर उस चीज़ और जीव के मूल तत्व को जान लेते हैं, जो कहीं भी मौजूद है। यह स्पष्टता उनके मन को शुद्ध करती है और उन्हें एक ऐसी निरपेक्ष बुद्धि प्रदान करती है, जिससे वे वास्तविकता या सत्य के मर्म को समझ पाते हैं। ऐसे ही लोगों को भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 16वें श्लोक में ‘तत्त्वदर्शी’ कहा गया है।

यह मूल तत्व ‘सत्’ है, जो स्वयं ईश्वर हैं। इसे जानने का दावा बहुत सारे लोग करते तो हैं, लेकिन वे उसे जानते नहीं हैं। इनके विपरीत, ‘तत्वदर्शी’ वे लोग होते हैं जो इस मूल तत्व के मूल स्वभाव, गुण, इच्छाओं, और उद्देश्यों को भली-भांति जानते हैं। वे सर्वाधिक बुद्धिमान मनुष्य होते हैं। वे ईश्वर को केवल एक चमत्कारी व्यक्ति के रूप में, और ‘सत्’ को केवल ‘सही’ मानी जाने वाले किसी विचार के रूप में नहीं देखते। इसके विपरीत, वे ज्ञान के उस स्तर तक पहुँच चुके होते हैं जहाँ वे केवल मान्यताओं और आस्थाओं के सहारे जीवन नहीं जीते, बल्कि वे यह जान लेते हैं कि ईश्वर और ‘सत्’—दोनों एक ही हैं। वे यह भी जान लेते हैं कि इन्हे किस प्रकार पहचानना है। निष्कर्षतः, वे कब, कहाँ और किस रूप में ईश्वर विद्यमान हैं, ये पहचान पाते हैं। 

चूँकि उनमें यह पहचान करने की समझ विकसित हो चुकी होती है कि ‘सत्’ क्या है, इसलिए वे उसके विपरीत—यानी ‘असत्’—को भी आसानी से पहचान पाते हैं। अब, क्योंकि वे ठीक-ठीक जानते हैं कि ‘सत्’ क्या है और ‘असत्’ क्या है, इसलिए वे यह भी जानते हैं कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में, इन दोनों की अंतिम गति क्या होती है। और वह गति यह है कि ‘सत्’ शाश्वत रहता है, जबकि ‘असत्’ अल्पकालिक होता है।

केवल शरीर ही मर सकता है, शरीर को धारण करने वाला—अर्थात् आत्मा—नहीं।

कृष्ण ने पहले बताया है कि ‘असत्’ स्थायी नहीं है और ‘सत्’ स्थायी है। वह आगे समझाते हैं कि शरीर ‘असत्’ है, जबकि शरीर को धारण करने वाला—अर्थात् आत्मा—’सत्’ है। इस प्रकार, आत्मा स्थायी है और शरीर नहीं। चूँकि शरीर अस्थायी है, इसलिए केवल इसी को हानि पहुँचाई जा सकती है या नष्ट किया जा सकता है। दूसरी ओर, आत्मा—जो शरीर को धारण करती है—’सत्’ है। अतः, इसे न तो हानि पहुँचाई जा सकती है और न ही नष्ट किया जा सकता है।

आत्मा को मापा नहीं जा सकता है, अर्थात वह भौतिक नहीं है।

अगली बात जो भगवान ने कही, वह आत्मा के विषय में थी। आत्मा को उन्होंने शरीर का आधार या मालिक बताया है। उन्होंने कहा कि आत्मा असीम और अविनाशी है; जिसका अर्थ निम्नलिखित है:

  • आत्मा को मापा नहीं जा सकता, जिससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा निराकार है; क्योंकि आप केवल भौतिक या आकारयुक्त पहलुओं को ही माप सकते हैं, अमूर्त पहलुओं को नहीं।
  • आत्मा को नष्ट या समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह भौतिक नहीं है, आकाररहित है; और निराकार चीज़ों को न तो कोई हानि पहुँचाई जा सकती है और न ही उन्हें मिटाया जा सकता है।

इन सभी बातों से यह सिद्ध होता है कि आत्मा भौतिकता या आकार से परे है। चूंकि यह द्रव्यमान वाली वस्तुओं, जीवों, या शक्तियों की श्रेणी में नहीं आती, इसलिए सभी तरह के फैसले लेने के लिए इसी को केंद्र में रखा जाना चाहिए। क्यों? क्योंकि द्रव्यमान से रहित वस्तुओं, जीवों, या शक्तियों में किसी भी प्रकार के लालच, डर, अहंकार, मोह, ईर्ष्या, जलन, आदि बुराइयों का कोई असर नहीं पड़ता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हर तरह का विकार द्रव्यमान वाले पहलुओं के कारण ही होता है। अब चूँकि आत्मा पर इन विकारों का असर नहीं होता, इसलिए उसमें किसी के प्रति कोई पक्षपात नहीं होता। परिणामस्वरूप, उसके सभी फैसले सिर्फ सार्वभौमिक न्याय के लिए अर्थात सभी मनुष्यों और जानवरों (वर्तमान और भविष्य में जन्म लेने वाले) के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए होते हैं। यही भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 16वें, 17वें और 18वें श्लोकों की मुख्य सीख है।

मुख्य शिक्षाएं 

भगवद्गीता के श्लोक 2.16, 2.17 और 2.18 तथा इस लेख की मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं।

  • माया (असत्) परम सत्य नहीं है, लेकिन मनुष्यों को यह परम सत्य जैसी लगती है, क्योंकि वे इसके परे मौजूद सत्य से अज्ञान हैं या उसे नज़रंदाज़ कर देते हैं।
  • सत्य (सत्) ही परम पूर्ण और अविनाशी है और इंसानों के मानने या न मानने से इस पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता; यह हमेशा वैसा ही रहता है।
  • अगर इंसान सत्य के मार्ग पर चलते हैं, तो वे ज्ञानी बनते हैं और मोक्ष की ओर बढ़ते हैं। अगर वे असत् या माया के मार्ग पर चलते हैं, तो वे मूर्ख बनते हैं और मानसिक गुलामी की ओर बढ़ते हैं।
  • सत्य का मार्ग सभी जीवों का कल्याण सुनिश्चित करता है और सत्य (सत्) ही हर भौतिक वस्तु और शरीर का आधार है। जो लोग इस बात को जान लेते हैं, वे हर चीज़ के मूल को जानने वाले अर्थात तत्त्वदर्शी होते हैं। ऐसे लोग सत् और असत् के बीच के अंतर को आसानी से समझ पाते हैं और ये भी जान लेते हैं कि भविष्य में प्रत्येक की गति क्या होनी है या उनसे क्या परिणाम निकलना है।
  • आत्मा ‘सत्’ है और शरीर माया (असत्) है। शरीर नष्ट हो सकता है क्योंकि यह माया (असत्) है; आत्मा नष्ट नहीं हो सकती क्योंकि यह ‘सत्’ (सत्य) है।
  • बिना किसी भेदभाव के सभी जीवों के कल्याण पर केंद्रित विचार, कर्म, और कथन ‘सत्’ या सत्य हैं, जबकि भेदभाव के साथ कुछ लोगों के कल्याण पर केंद्रित विचार, कार्य, और कथन ‘असत्’ या असत्य हैं।
  • असत् को भी जीवित रहने के लिए ‘सत्’ की आवश्यकता होती है। पापी मनुष्य भी ‘सत्’ को ढाल बनाए बिना ज़िंदा नहीं रह सकते।

निष्कर्ष

गीता के श्लोक 2.16 से 2.18 पर आधारित यह लेख बताता है कि ‘सत्’ या ‘सत्य’ — जो ईश्वर है, आत्मा है, और सभी जीवों का भला चाहने की भावना है — का अस्तित्व हमेशा बना रहता है। इसका अंत असंभव हैं क्योंकि ‘सत्’ या ‘सत्य’ के बिना कोई भी, यहाँ तक कि पापी और शैतान भी, जीवित नहीं रह सकता। इसलिए, हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम हमेशा ‘सत्’ (सत्य) के मार्ग पर चलें। साथ ही हमें यह भी चिंतन करते रहना चाहिए कि असल में ‘सत’ (सत्य) है क्या। गहन और निरंतर चिंतन से सत्य आपके चरित्र और सोच का अभिन्न अंग बन जाता है जिसके बाद आपको यह ज्ञान हो जाता कि आपका ‘सत्’ या ‘सत्य’ (वास्तविक स्वरूप) आत्मा है, शरीर नहीं।

जब यह बात सिर्फ़ विश्वास या अविश्वास न रहकर स्पष्ट अनुभव पर आधारित ज्ञान के रूप में आपके चित्त में स्थित हो जाती है, तब आप ‘सत्’ (सत्य) और ‘असत्’ (माया) के बीच के अंतर को आसानी से पहचानने लगते हैं। और तभी आप ‘तत्त्वदर्शी’ बन जाते हैं। तत्त्वदर्शी यानी वह व्यक्ति जो ‘सत्’ (निष्पक्षता और सबका भला) के आधार पर स्वतंत्र फ़ैसले ले सके, ‘सत्’ (सभी निर्दोष जीवों का भला चाहने की भावना) के रास्ते पर चल सके और ‘सत्’ (सभी बेगुनाह जीवों की सामूहिक रूप से) की रक्षा करने में समर्थ हो। ऐसे लोगों को न तो बहकाया जा सकता है न ही गुलाम बनाया जा सकता है। ये सर्वोच्च ज्ञान के स्वामी और हर पहलू पर स्पष्टता रखने वाले बुध्दिमान मनुष्य होते हैं। इसलिए, अभी से ‘तत्त्व-दर्शी’ बनने का अभ्यास शुरू करें, ताकि आप अपना चरित्र वैसा बना सकें जैसा ईश्वर चाहते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भगवद्गीता के श्लोक 2.16 में “असत् की सत्ता नहीं होती और सत् का अभाव नहीं होता” का क्या अर्थ है?

भगवद गीता का श्लोक 2.16 कहता है कि जो असत् है उसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है, और जो सत् है उसका अस्तित्व कभी खत्म नहीं होता। ये दोनों कथन मिलकर गीता में बताए गए परम सत्य के मूल स्वरूप को समझाते हैं।

पहले कथन, “असत् का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है” का अर्थ है कि सभी भौतिक वस्तुएं और शरीर तथा ऐसे कर्म और विचार जो सभी जीवों की भलाई (सार्वभौमिक कल्याण) के लिए नहीं है वे सभी अस्थायी होते हैं; वे पैदा होते हैं, अपना रूप बदलते हैं, और फिर खत्म हो जाते हैं। वे चाहे कितने भी ताकतवर, अच्छी तरह से स्थापित, और स्थायी क्यों न दिखें, उनका अंत उनके जन्म के साथ ही सुनिश्चित हो चुका होता है।

दूसरे कथन, “सत् का अस्तित्व कभी खत्म नहीं होता” का अर्थ है कि आत्मा तथा वे कर्म और विचार जो सभी जीवों की भलाई पर केंद्रित होते हैं वे शाश्वत हैं अर्थात उनका अंत असंभव है। इन्हें न तो बनाया जा सकता है, न मिटाया जा सकता है, और न ही घटाया जा सकता है। वे पहले भी थे, अभी भी हैं, और समय की किसी भी सीमा के बाद भी बने रहेंगे।

कुल मिलाकर, यह श्लोक अस्थायी और शाश्वत के बीच एक स्पष्ट अंतर बताता है: जो अस्थायी है, वह असल में कभी “सत्” था ही नहीं, और जो सचमुच सत् है, वह समय या विनाश के दायरे में न कभी आया है और न ही कभी आएगा।

भगवद्गीता के श्लोक 2.16 के अनुसार, सत्य और माया में क्या अंतर है?

भगवद्गीता के श्लोक 2.16 के अनुसार, सत्य वह है जो हमेशा रहता है। इसके अंतर्गत वह सब आता है जो प्रत्येक कालखंड में प्रासंगिक और जीव के अस्तित्व के लिए आवश्यक बना रहता है। सत्य कभी खत्म नहीं हो सकता और न ही यह कभी अप्रासंगिक हो सकता है; यह अपने स्वभाव से ही चिरस्थायी होता है।

दूसरी ओर, माया उन चीज़ों और पहलुओं को कहते हैं जो कुछ समय के लिए होते हैं, लेकिन बाद में मिट जाते हैं। सभी भौतिक और सांसारिक चीज़ें इसी श्रेणी में आती हैं — ये कुछ समय के लिए तो असली लगती हैं, लेकिन अस्थायी होती हैं और आखिरकार अपना रूप बदल लेती हैं या खत्म हो जाती हैं।

संक्षेप में, किसी भी चीज़ के भौतिक अस्तित्व के पीछे जो कुछ भी होता है — वह निराकार, कभी न बदलने वाली शक्ति या तत्व जो उसे जीवन देता है — वही सत्य है। जो कुछ भी केवल भौतिक है और अपने अस्तित्व के लिए उस मूल सत्य पर निर्भर है, वह माया है।

क्या भगवद्गीता के श्लोक 2.16 और 2.17 के अनुसार आत्मा अमर है?

हाँ। भगवद्गीता के श्लोक 2.16 और 2.17 के अनुसार, आत्मा अमर और अविनाशी है। श्लोक 2.16 बताता है कि जो असत् है, उसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता, जबकि जो सत् है, उसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता। आगे श्लोक 2.17 कहता है कि आत्मा वह शाश्वत तत्व है जो प्रत्येक शरीर में व्याप्त है, अविनाशी है और जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता।

ये श्लोक मिलकर यह सिखाते हैं कि भौतिक शरीर अस्थायी है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। शरीर बदल सकता है और अंततः नष्ट हो सकता है, लेकिन जीव का वास्तविक स्वरूप अर्थात आत्मा भौतिक विनाश से अप्रभावित रहता है।

अगर आत्मा अमर है, तो इंसान क्यों मरता है?

भगवद्गीता  के श्लोक 2.18 के अनुसार, शरीर इसलिए मरता है क्योंकि वह भौतिक और अस्तित्व के आधार पर सीमित है, जबकि आत्मा, जो उसके भीतर रहती है, वह शाश्वत और अविनाशी है। आत्मा का स्वरूप अमूर्त और अभौतिक होता है, इसलिए उसमें क्षय या विनाश की कोई स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती। वह परिवर्तन और विनाश को प्रेरित करने वाले भौतिक नियमों से परे है। इसके विपरीत, शरीर पदार्थ से बना है, और हर पदार्थ से बानी चीज़ में नश्वरता का गुण होता है; उसमें बदलाव और क्षय होना और अंततः उसका विनाश होना निश्चित है। भौतिक अस्तित्व का स्वभाव ही ऐसा है।

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