भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 14 और 15: एक रहस्य जो सही निर्णय लेना सिखा दे

भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 और 15 की शिक्षाओं को दर्शाते हुए एक चित्र। इसमें एक व्यक्ति एक दोराहे पर खड़ा है; एक तरफ़ अंधेरा रास्ता है जो डर, दुख, क्रोध और भावनात्मक आवेगों का प्रतीक है, और दूसरी तरफ़ सुनहरा चमकदार रास्ता है जो ज्ञान, धर्म और मोक्ष का प्रतीक है।
भगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 14 और 15 - क्षणिक भावनाओं के वश में आकर कार्य करने के बजाय विवेक के आधार पर निर्णय लेकर धर्मयुक्त कर्म करें और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करें।

भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 और 15 हमें सिखाते हैं कि कोई व्यक्ति सही फ़ैसला लेने की क्षमता कैसे विकसित कर सकता है। वह बताते हैं कि बिना सन्यासी बने भी कोई व्यक्ति मोक्ष कैसे प्राप्त कर सकता है। वह हमें उन कारणों के बारे में स्पष्टता प्रदान करते हैं जिनकी वजह से लोग पाप या अमानवीय काम करते हैं या उन्हें होने देते हैं। यह लेख गीता के इन श्लोकों के शब्दशः अर्थ से शुरू होता है और फिर उनके मुख्य विचार, अहम सीखों, और उनमें बताए गए सिद्धांतों की पूरी प्रक्रिया को समझाता है। भगवद्गीता के श्लोक 2.14 और 2.15 की शिक्षाओं के गहन अध्ययन में उतरने से पहले, आइए मूल श्लोकों और उनके शाब्दिक अर्थ पर एक नज़र डालें।

भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 14 और 15

नीचे संस्कृत में गीता के श्लोक 2.14 और 2.15 दिए गए हैं, साथ ही उनका हिंदी अनुवाद भी है।

संस्कृत श्लोक

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥14॥

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ |
समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || 15||

हिंदी अनुवाद

हे कुंती-पुत्र (अर्जुन)! गर्मी, सर्दी, सुख और दुख केवल इंद्रियों के विषय हैं। वे आते-जाते रहते हैं; वे हमेशा नहीं रहते। ॥14॥ तुम्हें (मनुष्यों को) उन्हें सहन करना चाहिए। हे श्रेष्ठ मनुष्य! जो मनुष्य इन सब बातों से बिल्कुल भी विचलित नहीं होते, जो सुख और दुख में सम रहते हैं, और जो धैर्यवान होते हैं—वे ही मोक्ष को प्राप्त करते हैं। || 15||

व्याख्या, वास्तविक मर्म, और शिक्षाएं

गीता के ये दो श्लोक काफी महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें श्री कृष्ण अर्जुन को और हमें यह बताते हैं कि कोई व्यक्ति धर्म के मार्ग से क्यों भटक जाता है। वह कहते हैं कि इंसान केवल शरीर और इंद्रियों से जुड़ी भावनाओं के कारण ही ख़ुशी और दुख का अनुभव करता है, और इन्ही में लिप्तता के कारण वह अक्सर सही मार्ग की पहचान नहीं कर पाता। कृष्ण रूप में ईश्वर कहते हैं कि मनुष्य को सुख, दुख, भय, अहंकार जैसी शारीरिक या इन्द्रिय आधारित भावनाओं को सहन करना चाहिए, और अपनी बुद्धि का उपयोग करके समस्त जन-जीव के कल्याण को ध्यान में रखकर ही कर्म करना चाहिए। वह कहते हैं कि जिन लोगों के निर्णय इन्द्रियविषयों से नहीं, बल्कि स्थिति पर किए गए विवेकपूर्ण चिंतन से प्रेरित होते हैं, केवल वही लोग मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

इंद्रिय-जनित भावनाओं में लिप्तता किस प्रकार मानवता के मार्ग से विचलित करती है।

जब इंसान किसी शारीरिक इंद्रिय-आधारित भावना में फँस जाता है या उसमें पूरी तरह डूब जाता है, तो वह सार्वभैमिक न्यायसंगतता को ताक पर रखकर स्थिति को अपने लिए सुखद बनाये रखने की कोशिश करता है। स्थिति को अपने लिए सुखद बनाए रखने की प्रबल इच्छा, उसे सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण को नज़रअंदाज़ करने के लिए प्रेरित करती है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य वही करता है जिसे करने से, उसे लगता है, कि उसे खुशी मिलेगी या उसकी ख़ुशी की निरंतरता बनी रहेगी। इसके लिए कभी वह उसे दबाता है जो सही है, तो कभी उसका साथ देता है जो गलत है। वह ये सब सिर्फ किसी भी प्रकार की संघर्ष की स्थिति से बचने के लिए करता है। हालाँकि, अधर्मी या आसुरी प्रवृत्ति के लोग अपनी कट्टर और अमानवीय विचारधारा से कोई समझौता नहीं करते, क्योंकि उनके मन में न तो निर्दोषों के प्रति कोई दया होती है और न ही वे ये चाहते हैं कि दूसरे लोग जीवित रहें। इसका परिणाम यह होता है कि स्थिति और ख़राब हो जाती है, क्योंकि कोई प्रतिरोध न होने से अधर्मी और आसुरी लोग और भी अधिक शक्ति के साथ कुकर्म करना शुरू कर देते हैं।

इस प्रकार, जो व्यक्ति संघर्ष से बचने के लिए, और स्थिति को शांत बनाए रखने की चाह में बुराई से समझौता करता है, उसका फिर से शोषण होता है। और यह चक्र लगातार चलता रहता है—जहाँ असंवेदनशील और आसुरी लोग और मज़हब अत्याचार करते रहते हैं, और संवेदनशील मनुष्य उनसे समझौता करते रहते हैं। इससे बुराई को ताकत मिलती है, और अच्छाई तथा न्यायसंगतता दब जाती है; जिसके परिणामस्वरूप समाज और दुनिया से इंसानियत खत्म होती जाती है। इसलिए, हमें अपनी भावनाओं को अपने निर्णयों पर हावी नहीं होने देना चाहिए; बल्कि हमें निष्पक्ष रूप से यह विचार करना चाहिए कि मानवता के अनुसार क्या सही होगा। हमें दुख, भय जैसी शारीरिक इंद्रियों से उत्पन्न होने वाली भावनाओं को सहन करते हुए, जो सभी मनुष्यों और जीवों के लिए हितकर हो, उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए।

आइए, इस अवधारणा को कुछ शारीरिक अनुभूतियों के माध्यम से समझते हैं।

अगर दुख को सहन न किया जाए, तो वह आपको बुराई का समर्थक कैसे बनाता है?

इसका सबसे अच्छा उदाहरण तब के अर्जुन थे, जब वह इस विचार से दुखी हो रहे थे कि उनके परिवार के लोग युद्ध में मारे जाएँगे। चूँकि वह अपने परिवार के सदस्यों (कौरवों) की मृत्यु के बाद, महसूस होने वाले दर्द को सहन करने को तैयार नहीं थे, इसलिए वे बुराई (कौरवों) के खिलाफ़ लड़ने से बच रहे थे। ऐसा करके वह बुराई को फ़लने-फूलने देने और उसे और भी ज़्यादा शक्तिशाली होने देने का रास्ता खोल रहे थे। और ये सर्वविदित है कि बुराई के अधिक शक्तिशाली होने से निर्दोष लोगों का और भी ज़्यादा दमन होने की संभावना बढ़ जाती है। 

इसके विपरीत, जब उन्होंने ईश्वर के मार्गदर्शन से, कौरवों की मृत्यु से होने वाले संभावित दुख को सहन करने का फ़ैसला किया, तो उन्होंने उनके खिलाफ़ युद्ध किया, और उन सभी लोगों को खत्म कर दिया, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी स्त्री की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने के विचार का समर्थन किया था।

अगर आज के उदहारण से इस बात को समझना हो तो हम किसी परिवार, समाज, या देश का उदाहरण ले सकते हैं, जहाँ लोग जानवरों को मारकर खाना पसंद करते हैं। दूसरे लोग, जो ऐसा नहीं करते हैं, वे भी अक्सर जीव-हत्यारों की इस इच्छा और कार्य का समर्थन करते हैं या इसे बर्दाश्त कर लेते हैं। वे ऐसा इस डर से करते हैं कि कहीं बेकसूर जानवरों को खाने वाले ये लोग नाराज़ न हो जाएँ। उन्हें ऐसा लगता है कि अगर ये जीव-हत्यारे नाराज़ हो गए, तो इंसानों के बीच का आपसी भाईचारा कम हो जाएगा, जिससे दुख की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। चूँकि वे इस दुख को सहने के लिए तैयार नहीं होते हैं, इसलिए वे उस बुराई का विरोध नहीं करते जो बेकसूर जानवरों को मारकर खाने के कुकृत्य को बढ़ावा देती है। अगर वे इस दुख को सहने के लिए तैयार होते, तो वे उनके खिलाफ आवाज़ उठाते और देर-सवेर इंसानों के बीच से इस बुराई को खत्म कर देते।

यदि भय को सहन न किया जाए, तो वह आपको बुराई को सशक्त करने वाला कैसे बनता है ?

इसका सबसे अच्छा उदाहरण दुनिया भर के गैर-मुस्लिम और मध्यममार्गीय-मुस्लिम हो सकते हैं, जो कट्टरपंथी मुस्लिमों से डरते हैं। ये गैर-मुस्लिम और मध्यममार्गीय-मुस्लिम न तो कट्टरपंथियों से लड़ते हैं और न ही उनके खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का डर रहता है कि कट्टरपंथी उन्हें और उनके परिवारों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। चूँकि वे डर को सहन नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें डराकर मज़हबी कट्टरता नामक बुराई के खिलाफ खड़े न होने के लिए राज़ी किया जाता है। जब वे कट्टरपंथियों के खिलाफ खड़े नहीं होते हैं, तो कट्टरपंथी और ज़्यादा ताकत के साथ, और लोगों को कट्टर बनाकर, ज़्यादा से ज़्यादा बेकसूर व गैर-कट्टर लोगों पर अत्याचार कर पाते हैं। इस तरह, भयभीत लोग डर को सहन न करके और उसी डर के साये में जीना स्वीकार करके, मज़हबी कट्टरता को और ताकत देते हैं।

इसके विपरीत, यदि वे डर को सहने और उस पर जीत हासिल करने की मानसिक क्षमता विकसित कर लेते हैं, तो वे कट्टरवाद को खत्म करने की ओर अपना कदम बढ़ाकर, दुनिया भर में एक स्वस्थ, मानवता-केंद्रित समाज के निर्माण में योगदान दे सकते हैं। ऐसे सहनशील लोग पहले तो कट्टरपंथियों से डरकर बेचैन हो सकते हैं। वे शुरुआत में अपनी और अपने परिवार की जीवन को हानि पहुंचने के विचार से ख़ौफ़ज़दा भी हो सकते हैं। लेकिन बाद में, वे, अल्पकालिक शांति के बदले, कट्टरवाद के आगे झुकने से इनकार कर देते हैं, क्योंकि वे विश्व में कभी ख़त्म न होने वाली शांति की स्थापना करने की सोच लेते हैं। और इसीलिए वे डर से जन्मे मानसिक और भावनात्मक दर्द को सहना चुनते हैं। यह दृढ़ संकल्प उन्हें “जो होगा देखा जायेगा” वाली एक चुनौती भरी मानसिकता की ओर ले जाता है, जिससे उनमें सही बात कहने और कट्टरवाद की बुराई का सीधे-सीधे सामना करने का साहस पैदा होता है। अंततः, यह सहनशक्ति बहादुरी में बदल जाती है, और फिर मज़हबी और अन्य प्रकार के कट्टरवाद को खत्म करने का मार्ग प्रशस्त करती है।

इन उदाहरणों से पता चलता है कि इंद्रिय-जनित भावनाओं में अत्यधिक लिप्तता, लोगों को परोक्ष रूप से अमानवीय मार्ग का समर्थन करने या उस पर चलने की ओर अग्रसर करती है। और जब वे उस मार्ग पर चल पड़ते हैं, तो वे कई ऐसी चीज़ों, स्थितियों, आदि को सुख, सुविधा, भाईचारा आदि समझने लगते हैं, जो वास्तव में इनमे से कुछ भी नहीं हैं। वे इस भ्रमजाल में इस कदर फंस जाते हैं कि वे उस धर्म-मार्ग से भटक जाते हैं जो मोक्ष—अर्थात् परम मुक्ति—की ओर ले जाता है। यही कारण है कि श्री कृष्ण ने अर्जुन को (और हम सभी को) यह शिक्षा दी कि हम इंद्रिय-जनित भावनाओं में लिप्त न हों, बल्कि उससे पैदा होने वाले ताप, दर्द, आदि को सहन करें, और अपनी शुद्ध बुद्धि के आधार पर, धर्म-सम्मत अर्थात सही निर्णय लें।

भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 और 15 की प्रमुख  शिक्षाएं

भगवत गीता के इन श्लोकों से हमें निम्नलिखित सीख मिलती है:

  • जब आप इंद्रियों से जुड़े किसी भी मामले के कारण उत्पन्न होने वाले मनोवेग, पीड़ा, दुख आदि को सहन नहीं कर पाते हैं, तो आप बुद्धिमानी छोड़कर पक्षपातपूर्ण ढंग से कार्य करने लगते हैं। 
  • इस तरह के पक्षपातपूर्ण निर्णय और कर्म आपको अधर्म का सिपाही (ऐसा व्यक्ति जो मानवता के विरुद्ध हो) बना देते हैं, जो कि मोक्ष के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति का लक्षण नहीं है। 
  • यदि आप तीव्र इच्छाओं, पीड़ा, दुख आदि को सहन करने का अभ्यास करते हैं, तो आप इंद्रियों से उत्पन्न भावनाओं के आधार पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय, हर स्थिति पर सोचने-विचारने के लिए समय निकल पाते हैं। 
  • जब आपके पास सोचने के लिए पर्याप्त समय और भावनाओं से उत्पन्न ताप, दर्द, आदि को सहन करने का दृढ़ संकल्प होता है, तो आपके पूर्णतः धर्मसम्मत मार्ग को खोज पाने या पहचान पाने की सम्भावना बढ़ जाती है। और जब आप उस मार्ग पर चलते हैं, तो आप मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं।

निष्कर्ष

गीता के श्लोक 2.14 और 2.15 पर आधारित यह लेख इंद्रियों से जुड़ी भावनाओं के नियंत्रण से मुक्त रहने के बारे में स्पष्टता देता है। ऐसा नहीं है कि इन्द्रिय आधारित भावनाओं को ख़त्म कर देना है, लेकिन बिना सोचे-समझे सिर्फ उस भावना से उत्पन्न आवेग या अवसाद के प्रभाव में आकर कार्य  नहीं करना है। यह लेख बताता है कि भावनाओं को एक तरफ रखकर, समझदारी से सभी आयामों पर विचार करें और फिर निर्णय लें कि क्या करना सभी जीवों के लिए सही होगा। यह बताता है कि हमारे निर्णय इंद्रियों से जुड़ी भावनाओं से प्रेरित नहीं होने चाहिए, बल्कि किसी काम को करने या न करने से प्रभावित होने वाले सभी पहलुओं पर निष्पक्ष और दबावरहित चिंतन पर आधारित होने चाहिए। अगर इस लेख से आपको गीता के विचारों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली है, तो हमारे अन्य श्लोकों की व्याख्या भी देखें। यदि आपके पास श्लोक की व्याख्या को और बेहतर बनाने के लिए कोई सुझाव है, तो कृपया कमेंट सेक्शन में साझा करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 14 और 15 की मुख्य शिक्षा क्या है?

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 14 और 15 सिखाते हैं कि सुख, दुख, गर्मी, सर्दी, खुशी और गम जैसे शारीरिक अनुभव अस्थायी होते हैं। श्री कृष्ण बताते हैं कि मनुष्यों को इन बदलती भावनाओं को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने देना चाहिए, बल्कि उन्हें सहन करना चाहिए। जो व्यक्ति स्थिर रहता है और भावनाओं के आवेग या अवसाद में आकर काम करने के बजाय समझदारी से काम करता है, वह मोक्ष प्राप्ति के योग्य हो जाता है।

श्री कृष्ण हमसे सुख और दुख को सहन करने के लिए क्यों कहते हैं?

श्री कृष्ण समझाते हैं कि सुख और दुख दोनों ही बाहरी दुनिया के साथ शरीर के संपर्क से पैदा होते हैं और हमेशा नहीं रहते। अगर लोग इनमें से किसी में भी आसक्त हो जाते हैं, तो वे ऐसे पक्षपाती फ़ैसले लेने लगते हैं जो उन्हें सही रास्ते से भटका देते हैं । वहीँ अगर मनुष्य इन अस्थायी अनुभवों को सहन करना सीख ले और उनके प्रभाव में न आये तो वह साफ़-साफ़ सोच पाता है कि सही क्या है और गलत क्या है, और ऐसा रास्ता चुन पाता है जिससे मानवता का भला हो।

क्या भगवद्गीता हमें अपनी भावनाओं को दबाना सिखाती है?

नहीं, भगवद्गीता भावनाओं को दबाने की शिक्षा नहीं देती। यह लोगों को सिखाती है कि वे डर, दुख, क्रोध या खुशी जैसी भावनाओं के पीछे के कारण का आकलन तो करें, लेकिन उन्हें अपने निर्णयों और कार्यों पर हावी न होने दें। इसका मकसद यह है कि फैसले क्षणिक भावनात्मक आवेगों के बजाय समझदारी और धर्म (सभी जीवों के कल्याण को सुनिश्चित करने) के आधार पर लिए जाएं।

क्या भय और दुःख किसी व्यक्ति को अच्छाई के रास्ते से भटका सकते हैं?

हाँ, क्योंकि जब लोग दुःख और डर जैसी भावनात्मक परेशानी को सह नहीं पाते, तो वे इन भावनाओं के प्रभाव में आकर सही काम करने से पीछे हट जाते हैं। सामान्यतया लोग सिर्फ़ झगड़े या तकलीफ़ से बचने के लिए अन्याय के ख़िलाफ़ चुप रह जाते हैं, गलत काम होने देते हैं, और बुराई से समझौता कर लेते हैं। ये श्लोक सिखाते हैं कि यदि मनुष्य ऐसी भावनाओं को सहने का अभ्यास करे तो उसे धर्म के साथ रहने में मदद मिलती है।

भगवद गीता में ‘समदुःखसुखं’ का क्या अर्थ है?

‘समदुःखसुखं’ का अर्थ है सुख और दुख, दोनों ही स्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखना। इसका मतलब भावनाहीन हो जाना नहीं है; बल्कि इसका अर्थ है कि सुखद या दुखद अनुभव आपकी निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित न करें। ऐसी स्थिरता समझदारी भरे और सही निर्णय लेने में मदद करती है।

श्लोक 2.14 और 2.15 अर्जुन की दुविधा से कैसे संबंधित हैं?

अर्जुन युद्ध करने में हिचक रहे थे क्योंकि वह युद्ध में अपने परिजनों की मृत्यु की आशंका से दुःखी हो रहे थे। श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि अगर दुख को अपने फ़ैसले का आधार बनाया, तो धर्म का पालन करना संभव नहीं होगा। उन्होंने बताया कि व्यक्तिगत दुख को सहना सीखकर ही धर्म के अनुसार कर्म किया जा सकता है। कृष्ण की इसी शिक्षा के कारण अर्जुन बुराई को फलने फूलने देने के बजाय उसका अंत करने के लिए युद्ध कर पाए।

इन शिक्षाओं का रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या फ़ायदा है और इन्हे जीवन में कैसे उतारना चाहिए?

ये शिक्षाएँ लोगों को डर, गुस्से, खुशी या दुख पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय रूककर सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। चाहे पारिवारिक झगड़े हों, ऑफिस में चुनौतियाँ हों, सामाजिक अन्याय हो या नैतिक दुविधाएँ, इंसान को सबसे पहले अपनी भावनाओं के आवेग को सहना चाहिए, ध्यान से सोचना चाहिए कि असल में क्या करना सही है, और फिर भावनाओं के प्रभाव से ऊपर उठकर समझदारी से निर्णय लेना चाहिए।

मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवद्गीता के श्लोक 2.14 और 2.15 क्यों महत्वपूर्ण हैं?

इन श्लोकों के अनुसार, मुक्ति तब संभव होती है जब कोई व्यक्ति क्षणिक शारीरिक संवेदनाओं और भावनाओं के कारण नहीं बल्कि समझदारी से निर्णय लेता है। सुख और दुख दोनों स्थितियों में स्थिर रहकर और व्यक्तिगत सुविधाओं को गौण रखकर, हमेशा धर्मसंगत मार्ग को प्राथमिकता देने से, व्यक्ति धीरे-धीरे मुक्ति (मोक्ष) की ओर बढ़ता है।

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