भगवद्गीता अध्याय 2 के श्लोक 13 का अर्थ – आत्मा, मृत्यु, पुनर्जन्म और जीव का वास्तविक स्वरूप

भगवद गीता अध्याय 2 का श्लोक 13, शरीर और आत्मा के बीच समय के साथ बदलते रिश्ते को समझाता है। यह समझाता है कि जब कोई व्यक्ति जन्म लेता है, बड़ा होता है, बूढ़ा होता है और आखिर में मरता है, उस दौरान वास्तव में क्या हो रहा होता है। कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जिस तरह जीवात्मा शरीर धारण करने बाद बचपन से गुज़रकर जवानी और जवानी से गुज़रकर बुढ़ापे में जाती है, उसी प्रकार शारीरिक मृत्यु के द्वारा पुराने शरीर से गुज़रकर नए शरीर में जाती है। इन परिवर्तनों के दौरान मनुष्य के वास्तविक अस्तित्व (आत्मा) का कुछ भी नष्ट नहीं होता; सिर्फ़ बाहरी आवरण (शरीर) बदलता रहता है।

भगवद गीता का यह श्लोक धार्मिक चर्चाओं में अक्सर उद्धृत किए जाने वाले श्लोकों में से एक है क्योंकि यह दो छोटी लाइनों में उस आध्यात्मिक ज्ञान को आधार देता है जो कृष्ण आगे कहते हैं। यह एक साथ दो विचारों को आसानी से समझने और याद रखने में मदद करता है। एक यह कि शरीर अस्थायी है और दूसरा यह कि हम शरीर नहीं हैं। अक्सर लोग गीता जी से मृत्यु का सत्य जानने के दौरान सबसे पहले इसी श्लोक को समझते हैं, और इसीलिए यह श्लोक आध्यात्मिक अध्ययन से आगे बढ़कर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिलासा देने का एक ज़रिया भी बन गया है।

यह श्लोक उस सवाल का जवाब देता है जो लगभग हर कोई कभी न कभी किसी न किसी रूप में पूछता है: अगर मैं यह शरीर नहीं हूँ, तो जब यह शरीर मरता है तो मेरा क्या होता है? कृष्ण का जवाब है कि कोई भी “मैं” कभी भी कोई शरीर नहीं था। प्रत्येक “मैं” ने बस अपने अपने शरीर को पहना हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे उसने बचपन का शरीर और बाद में युवावस्था का शरीर पहना था। इसलिए शरीर का अंत पहनने वाले का अंत नहीं है, बल्कि अलग-अलग शरीरों में आत्मा अर्थात वास्तविक “मैं” की यात्रा का एक चरण भर है।

कृष्ण अर्जुन को यह बात ठीक इसी समय समझाते हैं क्योंकि अर्जुन युद्ध में दूसरों की मौत का कारण बनने के विचार से जन्मे दुख और डर के मारे जड़वत हो गए हैं। कृष्ण का मकसद सिर्फ़ अमूर्त दर्शन समझाना नहीं है — बल्कि सही काम न करने की वजह बने मृत्यु के डर को दूर करना है। अगर मौत किसी के वास्तविक अस्तित्व का विनाश नहीं बल्कि सिर्फ़ रूप बदलना है, तो अपनी या किसी और की मृत्यु के डर या दुःख के कारण अपने कर्त्तव्य का पालन न करना मिथ्या में जीने जैसा है।

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 13वें श्लोक की इस विस्तृत व्याख्या में, हम जानेंगे कि कृष्ण आत्मा, मृत्यु और पुनर्जन्म के बारे में क्या सिखाते हैं, और गीता के बाकी हिस्सों को समझने के लिए इस श्लोक को समझना क्यों ज़रूरी है।

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 13 (संस्कृत)

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।। 13 ||

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ

देहधारी (जीवात्मा) जिस प्रकार शरीर की बचपन, जवानी, और बुढ़ापे (जीर्णता) की अवस्थाओं को प्राप्त करते हैं। उसी तरह, वे नए शरीरों को प्राप्त करते हैं। जो धैर्यवान (बुद्धिमान और मानसिक स्थिरता के धारक) होते हैं, वे उन (शरीर के प्रकार और अवस्थाओं) में मोहित नहीं होते।

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 13 की व्याख्या, वास्तविक मर्म, और शिक्षाएं

गीता श्लोक 2.12 में कृष्ण ने, मनुष्य का वास्तिविक अस्तित्व आत्मा है, ये समझाया। उन्होंने समझाया कि कई शारीरिक मृत्युओं के बाद भी, हमारे आत्मा रूप सत्य स्वरुप का नाश नहीं हो सकता। वो आगे कहते हैं कि शरीर लगातार बदलता रहता है, और फिर एक दिन ऐसा आता है जब यह आत्मा के लिए पूरी तरह से बेकार हो जाता है, और इसलिए उसे शरीर छोड़ना पड़ता है। कुछ जीवात्माएं शरीर में रहते हुए भी ज्ञान और अध्यात्म का अभ्यास करती रहती हैं इसलिए उन जीवात्माओं को पता होता है कि उन्हें जल्द ही एक नया शरीर मिलेगा, लेकिन ज़्यादातर जीवात्माएँ जो, शरीर में रहते हुए, ज्ञान और अध्यात्म का अभ्यास नहीं करतीं, उन्हें उस पुराने शरीर से इतना मोह हो जाता है कि उन्हें एहसास ही नहीं होता कि वे अभी भी ज़िंदा हैं और दूसरे शरीर में जाने के परिवर्तनकाल में हैं। इस सिद्धांत को आसानी से समझाने के लिए, श्री कृष्ण शरीर की अलग-अलग अवस्थाओं के उदाहरण देते हैं। उनके उदाहरणों से हमें निम्नलिखित बातें समझ में आती हैं।

अगर आप स्वयं को सिर्फ़ एक शरीर मानते हैं, तो आपको यह जानना चाहिए कि आप हर पल मरते और पैदा होते हैं। हर पल आपके शरीर की कई पुरानी कोशिकाएं मरती हैं और कई नई कोशिकाएं पैदा होती हैं। तो जब इंसान की कोशिकाएं अलग-अलग नष्ट होती हैं, अर्थात उसका शरीर रोज़ थोड़ा थोड़ा मरता है, तब उस मौत से आप दुखी नहीं होते। लेकिन जब वे सब एक साथ नष्ट होने लगती हैं, जिसे मनुष्य शरीर की मृत्यु कहते हैं, तब आप दुखी होते हैं। क्यों? क्योंकि निरंतर कोशिका-रूप में होती हुई मृत्यु के बाद भी नया कोशिका-रूप शरीर आपकी आँखों के सामने नया जन्म ले रहा होता है और उससे पहले हुई मृत्यु को आपकी आंखे देख नहीं पातीं, उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता कि किसी कोशिका की मृत्यु भी हुई है। दूसरी ओर, जब किसी मनुष्य की सभी कोशिकाएं एक साथ मरने लगते हैं, तब आप मृत्यु को तो पहचान लेते हैं, लेकिन उसके एक अलग रूप में दोबारा जन्म लेने की घटना को आप नहीं देख पाते, जिसके कारण उन्हें नया शरीर मिलने पर आप उन्हें पहचान नहीं पाते। और यही वजह है कि आप किसी इंसान की पूर्ण मृत्यु पर रोते हैं, लेकिन उसकी निरंतर होती मृत्यु पर नहीं। 

इसका मतलब यह है कि आप उसकी मौत पर नहीं रोते, बल्कि उसकी एक मौत के बाद, उसका नया जन्म होने पर, उसे पहचान न पाने की वजह से रोते हैं। अब आप इसके लिए क्या करेंगे? आप ऐसा कर सकते हैं कि या तो आप अपने अंदर अपने मरे हुए प्रियजनों के नए रूपों को पहचानने की क्षमता विकसित करें या इस बात को समझें कि वह मरा नहीं है, बल्कि उसने बस अपना रूप बदल लिया है। हालांकि कृष्ण चाहते हैं कि हम दूसरी बात पर ध्यान दें क्योंकि वही सबसे सटीक तथ्य है, लेकिन फिर भी, आइए हम इन दोनों बातों को एक-एक करके समझने की कोशिश करें।  

आप या आपके प्रियजन मरते नहीं हैं, बल्कि अपना विस्तार कर लेते हैं या नया रूप ले लेते हैं।

यह पहलू उन लोगों के लिए है जो सोचते हैं कि वे शरीर हैं और आत्मा जैसा कुछ नहीं होता। ऐसे लोग बहुत समझदार नहीं होते, लेकिन वे खुद को किसी महान वैज्ञानिक से कम नहीं समझते। वे हमेशा आपसे हर चीज़ का, जिसमें भगवान भी शामिल हैं, वैज्ञानिक सबूत मांगेंगे। उनकी सोच इतनी संकुचित होती है कि वे ये सोच ही नहीं पाते कि विज्ञान तभी अस्तित्व में आया जब भगवान ने धरती, ब्रह्माण्ड, अदि बनाया। तो, ऐसे लोग, जो सिर्फ भौतिक और पदार्थवादी विज्ञान में विश्वास या अन्धविश्वास करते हैं और उससे आगे के विज्ञान (जैसे आध्यात्मिक विज्ञान, आदि) को नहीं समझ सकते, उन्हें ये समझने के लिए कि कोई कभी नहीं मरता, इस पहलू  को समझना चाहिए।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से मृत्यु को समझना

सभी लोग (शरीर) कण, परमाणुओं, और अणुओं से बने हैं। आपके जन्म की प्रक्रिया के दौरान, कण, परमाणु, अणु, आदि एक दुसरे से जुड़कर एक शरीर बनाते हैं जिसे जन्म के बाद आप के नाम से जाना जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि जितने भी भैतिक तत्वों से मिलकर आपका शरीर बना है ये सब आपके शरीर बनने से पहले नहीं थे। ये तब भी थे, शायद, आपकी माँ या पिता के शरीर में खून के रूप में जिसका इस्तेमाल आपके शुरुआती रूप अर्थात अंडाणु और शुक्राणु बनाने के लिए किया गया था। अगर आप इससे पहले की स्थिति का चिंतन करें, तो आप पाएंगे कि जो तत्व आपके माता-पिता में खून के रूप में जीवित थे, वे शायद, उससे पहले, उनके द्वारा खाये गए अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थों के रूप में ज़िंदा थे। जब आप अपनी माँ के गर्भ में अंडाणु और शुक्राणु के मिलन से बच्चा बनने वाले थे, तब भी आपके विकास और विस्तार के लिए आवश्यक अतिरिक्त तत्व (कण, परमाणु, अणु, आदि) उनके शरीर में खून और उनके द्वारा खाए गए खाने (भोजन) के रूप में ज़िंदा थे।

अगर आप इसी तरह परत-दर-परत चिंतन करते रहें, तो आप यही पाएंगे कि आपके अंदर के तत्व (कण, परमाणु, अणु, आदि) हमेशा अलग-अलग नामों और रूपों में कहीं न कहीं मौजूद थे, वे कभी खत्म ही नहीं हुए। इसका मतलब है कि जब वे, जिन्हें अभी आप के नाम से जाना जाता है, आप के नाम से नहीं जाने जाएंगे, ज़ाहिर है कि आपकी मौत के बाद, तो वे किसी और नाम से जाने जाएंगे। दफ़नाए गए शरीर के तत्व शायद मिट्टी बन जाएंगे और जलाए हुए शरीर के तत्व शायद इलेक्ट्रॉन वगैरह बन जायेंगे। इसी प्रकार कुछ शरीर या शरीर के तत्व शायद जल या दुसरे अलग अलग नाम और रूप बन जायेंगे। 

आगे क्या होता है?

ये तत्व (कण, परमाणु, अणु, आदि) जिन्हें पहले “आप” कहा जाता था, वे आपकी शारीरिक मृत्यु की घटना के बाद पानी, आग, मिट्टी, हवा, आदि बन जाते हैं। उसके बाद, वे इन्हीं में से किसी के नाम से जाने जाते हैं। बाद में जब पौधे, जानवर, और दूसरे इंसान उनका उपभोग करते हैं तो यही तत्व जो पानी, आग, मिट्टी, हवा, आदि बन गए थे, उनका उपभोग करने वाले वृक्ष, जीव-जंतु, या  मनुष्य अदि बन जाते हैं। इस प्रकार, वे हमेशा इसी ब्रह्माण्ड, आदि में अलग-अलग रूपों में मौजूद रहते हैं जहाँ आप हैं।

इसका मतलब है कि आप या आपके अपनों का अस्तित्व किसी ऐसी घटना के बाद, जिसे अक्सर मौत कहा जाता है, ख़त्म नहीं होता, वे इस घटना के बाद भी किसी दुसरे रूप और नाम से अस्तित्व में रहते हैं। और अगर आप सच में उनसे प्यार करते हैं, तो आपको अपने आस-पास की हर चीज़ और हर जीव से प्यार करना शुरू कर देना चाहिए, जिसमें पेड़-पौधे, जल और जल निकाय, पृथ्वी और मिट्टी, हवा और पर्यावरण, जानवर और मनुष्य, और आपके आस-पास पाए जाने वाले ऐसे ही कई और जीव और प्राकृतिक चीज़ें शामिल हैं। आपको उनसे वैसे ही प्यार करना चाहिए, और वैसे ही उनकी रक्षा करनी चाहिए जैसे आप अपने माता-पिता, बच्चों और दूसरे अपनों से करते हैं, क्योंकि वे उन्हीं तत्वों  (कण, परमाणु, अणु , अदि) के अलग-अलग रूप हैं जो पहले आपके अपनों के रूप में मौजूद थे। यह भी याद रखें कि सच्चे प्यार का मतलब अपने प्रिय से कुछ भी उम्मीद न करना है, इसलिए अपने प्रियजनों के इन नए रूपों से कुछ भी उम्मीद किये बिना उन्हें प्रेम और सुरक्षा दें। इसी को प्रेम कहते हैं, इसके विपरीत अपेक्षा सहित लगाव मोह होता है। मोह और प्रेम को समझने के लिए आप हमारी भगवद्गीता श्लोक 2.2 की व्याख्या को पढ़ सकते हैं। 

आप या आपके प्रियजन मरते नहीं हैं, बल्कि अपना रूप बदल लेते हैं।

अब आइए इस भगवद गीता श्लोक को हमारे वास्तविक रूप अर्थात आत्मा के संदर्भ में समझते हैं। तो, जब आप यह बात जान या मान लेते हैं कि आपका वास्तविक अस्तित्व आत्मा है, न कि शरीर, तब आपको पूरी तल्लीनता से आत्मा की तरह ही व्यव्हार करना चाहिए, शरीर की तरह नहीं। और आत्मा की तरह व्यव्हार करने के कुछ लक्षण निम्लिखित हैं। 

  • आपके शरीर को होने वाले संभावित नुकसान से आपको नहीं  डरना चाहिए, क्योंकि आप शरीर नहीं हैं।
  • आपको अपनी शारीरिक पहचान से जुड़ी अपनी इज़्ज़त, प्रतिष्ठा, आदि के नुकसान से नहीं डरना चाहिए, क्योंकि वह शरीर की है न कि आपकी।
  • आपको बड़ा या बेहतर होने का घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह बड़ा और बेहतर होना आपके शरीर के बारे में है, न कि आपके अर्थात आत्मा के बारे में। 
  • आपको ऐसा कोई भी कर्म या भोग नहीं करना चाहिए जो किसी और शरीरधारी के शोषण का कारण हो क्योंकि असली आप अर्थात आपकी आत्मा को भविष्य में उस जाति के शरीर में भी निवास करना पड़ सकता है। और आने आप (आत्मारूप) पर भविष्य में अत्याचार करवाने की योजना बनाना तो मूर्खता ही है। 

खैर, चलिए अपने विषय पर आते हैं, जो यह है कि आप हमेशा अस्तित्व में रहते हैं, फिर चाहे आपका शरीर रहे या न रहे। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हमारा शरीर ज़िंदगी के हर पल अपना रूप बदलता रहता है। जब आप पैदा हुए थे, तो आप आकार में छोटे थे, आपके शरीर के अंग नरम थे और आपके अंदर एक आत्मा (असली आप) थी, जो उस शरीर को सांस लेने, खाने, पीने, रोने, आदि प्रकार से क्रियाशील रखती है।बाद में जब आप थोड़े बड़े होते हैं, तो आपके शरीर की कई चीज़ें बदल जाती हैं, खासकर आकार, लेकिन अंदर की आत्मा (असली आप) वही रहती है। बाद में, जब आप जवान होते हैं, तो कई दूसरी चीज़ें बदल जाती हैं, जैसे आपके जननांग, छाती, दाढ़ी, आदि, लेकिन तब भी आत्मा (असली आप) वही रहती है। इसी तरह, जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है, आपके शरीर के अलग-अलग अंग खराब होने लगते हैं, कई दुसरे अंग और अंग सम्बन्धी विषय बदल जाते हैं, लेकिन आपकी आत्मा (असली आप) अभी भी वही रहती है।

इस चित्र में इंसान की आकृति के चार चरण दिखाए गए हैं — बच्चा, युवा, बुजुर्ग और धुंधली होती आकृति जो मौत को दर्शाती है। हर आकृति के भीतर एक जैसी चमकती रोशनी है जो आत्मा का प्रतीक है। ये आकृतियाँ रोशनी की एक बहती हुई लकीर से एक-दूसरे से जुड़ी हैं, जो आत्मा की एक शरीर से दूसरे शरीर में यात्रा को दर्शाती है, जैसा कि भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 13वें श्लोक में बताया गया है।
जीवन के हर पड़ाव पर शरीर बदलता रहता है — लेकिन भीतर की आत्मा वही रहती है और मृत्यु के बाद एक नया शरीर पहनकर आगे की यात्रा करती है।

और अंत में, जब आपके शरीर का एक या कई ज़रूरी अंग काम करना बंद कर देते है, तो भगवान अपनी स्वचालित प्रणाली के माध्यम से आपकी आत्मा (असली आप) को उस अनुपयोगी शरीर को छोड़ने और नया शरीर मिलने तक इंतज़ार करने के लिए मजबूर करते हैं। और बाद में, आपको (आत्मा को) दुनिया में अपना अस्तित्व दिखाने और कर्म करने के लिए फिर से एक शरीर प्रदान किया जाता है। इस प्रकार, ऐसा समय कभी नहीं आता जब आप अस्तित्व न रहें, बस इतना होता है कि हर कोई आपके अस्तित्व को देख और/या पहचान नहीं पाता ।

क्या नया शरीर धारण कर चुकी आत्मा को पहचाना जा सकता है?

अब सवाल यह उठ सकता है कि शरीर की पूर्ण मृत्यु से पहले इंसान के शरीर में होने वाले बदलाव और शरीर की पूर्ण मृत्यु के बाद आत्मा का नए शरीर में जाना एक जैसा नहीं होता। तर्क यह हो सकता है कि शरीर की पूर्ण मृत्यु से पहले उसमें निरंतर कई बदलाव होने के बाद भी, उस शरीर को आप देखकर पहचान पाते हैं कि ये वही इंसान है जिसे कल या कुछ दिन पहले देखा था। इसके विपरीत, जब आत्मा को शरीर की पूर्ण मृत्यु के बाद बिल्कुल नया शरीर मिलता है, तो आप उसे देखकर यह पहचान नहीं पाते कि उस नए शरीर की जीवात्मा, जब पुराने शरीर में थी तब वह कैसी दिखती थी, कहाँ रहती थी, किस नाम से जानी जाती थी आदि। या फिर ये कहें कि आप पुराने शरीर से निकली जीवात्मा को नया शरीर मिलने पर, वह अगर नए शरीर के साथ दिख भी जाये, तो आप उसे पहचान नहीं पाते। 

यह बात तर्कसंगत है, तो चलिए अब इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं। यह दावा कि शरीर की पूर्ण मृत्यु से पहले, शरीर में कई बदलाव होने के बाद भी आप उस इंसान को पहचान सकते हैं, अधूरा है। क्यों? क्योंकि हर कोई उस जवान इंसान को नहीं पहचान सकता जिसे उसने उसके बचपन या शैशवावस्था में देखा हो। सिर्फ़ दो तरह के लोग ही ऐसे इंसान को पहचान सकते हैं:

  • जिसकी आँखों के सामने उसकी शारीरिक अवस्थाएं बदल रही हों अर्थात जो हमेशा उसके साथ रहता है या छोटे छोटे समयांतराल पर उससे मिलता रहता है। 
  • जो चेहरे, आंखों, रवैये, और दुसरे शारीरिक पहलुओं का अच्छा प्रेक्षक या विश्लेषक हो।

इन दो प्रकार के लोगों के अलावा कोई भी आपको, आपके शरीर की उस अवस्था में नहीं पहचान सकता जिसमे उसने आपको पहले न देखा हो। क्यों? क्योंकि हर अवस्था में आपके चेहरे में कुछ बदलाव होते हैं और वे न तो आपके इतने करीब हैं कि आपके शारीरिक हावभाव को अच्छी तरह से पहचानते हों, और न ही उनमें चेहरों और दुसरे शारीरिक पहलुओं की अच्छे से विश्लेषण करके पहचानने की क्षमता है।

इसी प्रकार, आपकी आत्मा (असली आप) के सर्वथा एक नए शरीर में जाने के बाद भी सिर्फ वही लोग आपको पहचान सकते हैं:

  • जो आपके चारित्रिक स्वरूप या स्वाभाव के इतने करीब हों कि वे आपकी बातों और कर्मों को तब भी पहचान सकें, जब आप ये सब उनके सामने न कर रहे हों, बल्कि उन्हें किसी और के द्वारा बताया जा रहा हो कि ऐसा किसी ने किया है। आप के चारित्रिक स्वरुप से भली-भांति परिचित व्यक्ति समझ जायेगा कि ये अपने ही ने किया या कहा होगा।
  • जो आध्यात्मिक लोग हैं अर्थात जो स्वयं और जगत के आरम्भ के बारे में जानते हैं और उसी के आधार पर संसार के सभी पहलुओं पर चिंतन करते हैं और उसी के अनुसार सभी क्रियाएं सम्पादित करते हैं।  

चूँकि आज के इंसान भौतिकता में अत्यधिक लिप्त हैं, इसलिए वे न तो अपने अंदर आध्यात्मिक समझ को विकसित करने पर कार्य करते हैं और न ही दूसरों के चारित्रिक स्वरुप को समझने पर। वे बस भौतिक वस्तुओं को ढूंढते हैं, उन्ही पर अनुसन्धान करते हैं, उन्ही के भौतिक फायदों को समझते हैं, उन्ही को उपभोग करने, बेचने, और इकठ्ठा करने के तरीके सीखते हैं, उन्ही के बारे में पढ़ते, और उन्ही के लिए काम करते रहते हैं। वे अपनी पूरी ज़िंदगी भौतिक वस्तुओं और भौतिक आनंद देने वाले आयामों को पाने, उनका मज़ा लेने और उन्हें अपने पास संभाल कर रखने की व्यवस्था करने में बिता देते हैं। वे भौतिक वस्तुओं को इकठ्ठा करने और उनका उपभोग करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें आध्यात्मिकता का एक भी पहलू समझ नहीं आता। इसीलिए जब उनके अपने (अपनों की आत्माएं) एक नए शरीर में चले जाते हैं तो वे उन्हें पहचान नहीं पाते। अगर वे रोज़ अपने अंतःकरण (मन, बुद्धि, आदि) को आध्यात्मिकता पर अभ्यासित करें, तो उनमें आत्माओं को पहचानने की क्षमता ज़रूर विकसित हो जाएगी। वह भी, बिना उस शरीर का चिंतन किये जिसमे वह आत्मा पहले रह रही थी। इस प्रकार, वे जान पाएंगे कि पुराने शरीर से निकली आत्मा कहां जाती है, फलस्वरूप उन्हें अपनी या अपने अपनों की मौत पर दुख नहीं होगा। 

नोट: भगवद्गीता का, बिना किसी अपेक्षा के, अच्छी तरह से अध्ययन भी आध्यात्मिकता सीखने का एक प्रभावी तरीका है। याद रखें, अपने मन और मस्तिष्क में किसी भी व्यक्ति, वस्तु, विद्या, स्थिति आदि को पाने की उम्मीद न रखना, अध्यात्म की ओर आपका पहला कदम होता है।

भगवद् गीता, अध्याय 3, श्लोक 13 की प्रमुख शिक्षाएं

आत्मा और शरीर का यह सिद्धांत सिखाने के पीछे श्री कृष्ण का मकसद मनुष्यों को सभी जीवों के वास्तिविक अस्तित्व से अवगत कराना था। उनका मकसद लोगों को यह समझाना था कि:

  • आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है। जिस तरह शरीर की यात्रा बचपन, जवानी, और बुढ़ापे की अवस्थाओं से गुजरती है, उसी तरह आत्मा की यात्रा, एक शरीर की मृत्यु के बाद, दूसरा शरीर धारण करके जारी रहती है।
  • मृत्यु एक परिवर्तन है, अस्तित्व का अंत नहीं। जो मृत्यु दिखाई देती है, वह केवल शरीर के रूप में परिवर्तन है; वास्तविक स्वरूप अपरिवर्तित और अमर रहता है।
  • जो लोग आज आप के साथ हैं वो शारीरिक मृत्यु के बाद ख़त्म नहीं होते, बल्कि वे नया रूप (शरीर) लेकर नए लोगों के साथ रहने लगते हैं, इसलिए खुद की या किसी और की मौत के डर से बुरे काम करना और धर्मसंगत कर्म न करना मूर्खता है।
  • मनुष्यों को हमेशा याद रखना चाहिए कि अगर वे धर्म (सभी जीवों की भलाई के कार्य) करेंगे तो उनका और दुसरे मनुष्यों का (उन लोगों का भी जिन्हें धर्म की रक्षा के लिए मारना पड़ा) असली अस्तित्व फलता-फूलता रहेगा।
  • अगर मनुष्य मौत के डर से अधर्म करते हैं या धर्म करने से पीछे हटते हैं, तो किसी का भी (उन लोगों का भी जिनकी रक्षा से धर्म का त्याग हुआ) वास्तविक अस्तित्व  सुखपर्वक फल फूल नहीं सकेगा। क्योंकि हर जीव भविष्य में एक नए रूप में उपस्थित रहेगा, और अगर समाज की प्रवृत्ति किसी एक का भी शोषण करने की बन गई, तो हर एक का (उनका भी जिनकी रक्षा के लिए धर्म का त्याग किया गया या किया जा रहा है) शोषण होने की बारी ज़रूर आएगी। इसलिए, मौत का डर मन में रखे बिना, महिलाओं, मासूम मनुष्यों, और जीव-जंतुओं का शोषण करने की आदतों और इन्हे बढ़ावा देने वाले मानव-शरीरधारियों के अंत के लिए कार्य करें, युद्ध करें।

गीता 2.13 की ये शिक्षाएं आपको अपने साथ साथ सभी प्राणियों को शोषण-मुक्त भविष्य देने में योगदान करेंगी। अपने इस तरह के आचरण और कर्मों से आप  उन सब के लिए एक शोषण मुक्त भविष्य का निर्माण करेंगे जो मर चुके हैं, जो अभी ज़िंदा हैं, जो भविष्य में पैदा होंगे, और वे शोषक भी जिन्हें, दुनिया को शोषकों से मुक्त करने के लिए, आपने मृत्यु दंड दिया।

भगवद गीता श्लोक 2.13 और इस व्याख्या का सार

अध्याय 2 का श्लोक 13 हमें बताता है कि हमारे भौतिक और वास्तविक अस्तित्व में से कुछ भी कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता — बस उसका रूप बदलता है। अगर हम स्वयं को शरीर मानकर चलें, तो हम पाते हैं कि हमारा शरीर मिट्टी, पानी और हवा के रूप में मृत्यु के बाद भी पृथ्वी पर उपस्थित रहता है। और अगर हम स्वयं को आत्मा, जो हमारा परम सत्य है, वह मानकर चलें, तो भी हम बस एक शरीर से दूसरे शरीर में जाते हैं। इस प्रकार, मौत असल में अंत नहीं, बल्कि एक बदलाव है। सच तो यह है कि हम जिस चीज़ का दुख मनाते हैं, वह किसी वास्तविक नुकसान के कारण नहीं, बल्कि हमारे सत्य को न समझ पाने या न मानने के कारण उपजा मिथ्या भाव है।

यह ज्ञान सिर्फ़ मन को तसल्ली देने के लिए कही गयी कोई काल्पनिक बात नहीं है बल्कि यह वो सत्य है जिसका मकसद हमारे जीने के तरीके को बदलना है। जब मृत्यु का डर खत्म हो जाता है, तो जो कर्म करना सही है उसे करना आसान हो जाता है। अर्जुन और हम सभी के लिए कृष्ण की सीख यही है: अपना कर्तव्य निभाओ, शोषितों की रक्षा करो और हिम्मत से काम करो — इसलिए नहीं कि मृत्यु का कोई मतलब नहीं होता, बल्कि इसलिए कि मृत्यु हमारे वास्तविक अस्तित्व (आत्मा) का अंत नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भगवद्गीता के अध्याय 2 के 13वें श्लोक का क्या अर्थ है?

यह श्लोक बताता है कि जिस तरह शरीर बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही अंत में वह मृत्यु को भी प्राप्त होता है — और उसके भीतर की आत्मा उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए एक नए शरीर में चली जाती है। कृष्ण का कहना है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि एक और बदलाव है; यह उन बदलावों से अलग नहीं है जिनसे हम सब पहले भी कई बार गुज़र चुके है। जो लोग समझदार हैं, वे इस बात को समझते हैं और इन परिवर्तनों से परेशान नहीं होते।

क्या भगवद्गीता कहती है कि आत्मा कभी नहीं मरती?

हाँ। यह श्लोक उसी विचार को आगे बढ़ाता है जो ठीक इससे पहले कहा गया था कि व्यक्ति का वास्तविक अस्तित्व  — यानी आत्मा — कभी मर नहीं सकती। शरीर बदलता है और आखिर में नष्ट हो जाता है, लेकिन उसमें रहने वाली आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं।

कृष्ण बचपन, जवानी और बुढ़ापे की तुलना आत्मा के नए शरीर में जाने से क्यों करते हैं?

कृष्ण जीवन के इन जाने-पहचाने पड़ावों का ज़िक्र इसलिए करते हैं क्योंकि हर कोई अपनी शारीरिक पहचान खोए बिना इनमें से कई पड़ावों से गुज़र चुका होता है। बचपन में आपका शरीर जैसा था, वैसा अब नहीं है, फिर भी आप “आप” ही बने रहे। कृष्ण इसी तर्क को एक कदम और आगे ले जाते हैं: अगर आप उन बदलावों के बावजूद वही व्यक्ति बने रहे, तो मौत भी उसी क्रम में बस एक और बदलाव है — कोई बिल्कुल अलग घटना नहीं।

भगवद्गीता के अनुसार मृत्यु के बाद क्या होता है?

जब शरीर आत्मा को निर्धारित कर्म करने में सहायता करने में असमर्थ हो जाता है, तो आत्मा उसे छोड़ देती है और समय के साथ एक नए शरीर में प्रवेश करती है। एक शरीर से दूसरे शरीर के बीच के अंतराल में आत्मा का अस्तित्व खत्म नहीं होता — बस वह अपने वास्तविक अर्थात अदृश्य रूप में विचरती रहती है जिस कारण दूसरे लोग उसे देख या पहचान नहीं पाते।

क्या भगवद गीता पुनर्जन्म की संकल्पना का समर्थन करती है?

हाँ, गीता का यह श्लोक पुनर्जन्म के मूल सिद्धांतों में से एक है। यह आत्मा के एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की प्रक्रिया को उसी स्वाभाविक क्रम के विस्तार के रूप में बताता है, जिससे शरीर एक ही जीवन में गुज़रता है — यानी उम्र बढ़ना और बदलाव आना — बस यह प्रक्रिया मृत्यु की सीमा पार करके एक नए भौतिक रूप में जारी रहती है।

क्या लोग पुनर्जन्म के बाद आत्माओं को पहचान सकते हैं?

हाँ, ऐसा हो सकता है, लेकिन सिर्फ़ कुछ खास तरह के लोगों के लिए: या तो वे जो किसी दूसरे के आध्यात्मिक स्वभाव को बहुत गहराई से समझते हैं — यानी जो बाहरी रूप-रंग से परे जाकर उनके असली स्वरूप को महसूस कर सकते हैं — या फिर वे जिन्हें आम तौर पर गहरी आध्यात्मिक समझ हो। ज़्यादातर लोग भौतिक जीवन में ही उलझे रहते हैं, इसलिए उनमें यह क्षमता विकसित नहीं हो पाती; यही वजह है कि वे किसी प्रियजन के जाने को एक बदलाव के तौर पर नहीं, बल्कि हमेशा के लिए खत्म हो जाने के तौर पर देखते हैं, जबकि असल में यह एक ऐसा बदलाव है जिसे वे समझ नहीं पा रहे हैं।

भगवद्गीता के श्लोक 2.13 की व्यावहारिक शिक्षा क्या है?

सीख यह है कि मौत का डर — चाहे वह अपनी हो या किसी और की — कभी भी धर्म (मनुष्य रूप में अपने कर्त्तव्य) से पीछे की वजह नहीं बनना चाहिए। क्योंकि आपका असली अस्तित्व शरीर में होने वाले हर बदलाव, यहाँ तक कि मौत के बाद भी बना रहता है, इसलिए शारीरिक नुकसान के डर या दुख में आकर काम करना असल में हम क्या हैं, इसे गलत समझने जैसा है। इस बात को समझने से इंसान डर के काबू में रहने के बजाय हिम्मत और ईमानदारी से काम कर पाता है।

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