आधुनिक दुनिया में ‘धर्म’ एक ऐसी चीज़ है जिसका अर्थ, ज्यादातर लोगों को, गलत ही पता है। इसे अक्सर ‘मज़हब’, ‘पंथ’, ‘रिलिजन’, या ‘परंपरा’ जैसा कुछ माना जाता है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ नियमों, रीति-रिवाजों, और मान्यताओं से कहीं ज़्यादा गहरा है। धर्म के कई पहलू हैं, और उनमें से मुख्य पहलू नीचे दिए गए हैं।
- कर्तव्य
- सार्वभौमिक न्यायसंगतता
- वस्तुओं और शरीरों के गुण या विशेषताएँ
जब तक मनुष्य इनका सही अर्थ समझकर, सही तर्क के आधार पर अपने निर्णय न लेने लगे, तब तक उसके धर्म के मार्ग पर होने की संभावना न के बराबर है। आइए, धर्म के इन तीनों पहलुओं को एक-एक करके समझते हैं।
कर्तव्य – धर्म का एक पहलू
लगभग हर कोई समझता है कि ‘कर्तव्य’ का क्या अर्थ है, लेकिन अधिकतर को यह नहीं पता होता कि किस कर्तव्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ‘धर्म’ का अर्थ भी कर्तव्य ही है, लेकिन इसका तात्पर्य हमारे प्राथमिक कर्तव्य से है। मनुष्य के प्राथमिक कर्त्तव्य वह कर्म हैं जो एक मनुष्य के रूप में उसे करने चाहिए। किसी भी दुसरे पद या पहचान के आधार पर मनुष्य की जिम्मेदारियां उसके द्वितीयक कर्त्तव्य है। कर्तव्य तीन प्रकार के होते हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया है।
- अस्थायी कर्तव्य
- अर्ध-स्थायी कर्तव्य
- स्थायी या परम कर्तव्य
अस्थायी कर्तव्य
अस्थायी कर्तव्य वह जिम्मेदारियां हैं जिन्हे आप थोड़े समय के लिए निभाते हैं—जैसे कुछ घंटों, दिनों, महीनों या वर्षों के लिए। यह एक कर्मचारी के तौर पर आपके कर्तव्य हो सकते हैं, एक चौकीदार के तौर पर आपके कर्तव्य हो सकते हैं, या कोई भी ऐसा अन्य काम जिसके लिए आपको उत्तरदायी बनाया गया हो। यह किसी शिक्षक, राजनेता, सैनिक, समाज-सेवक, समाज के मुखिया, आदि के रूप में आपके कर्तव्य हो सकते हैं। ये कर्तव्य ‘अस्थायी’ इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि आप इनके लिए केवल तब तक ही जवाबदेह होते हैं, जब तक आप उस पद पर बने रहते हैं। जिस पल आप उस पद से मुक्त हो जाते हैं, उस पद से जुड़े कार्यों के लिए आप फिर जवाबदेह नहीं रह जाते।
अर्ध-स्थायी कर्तव्य
अर्ध-स्थायी कर्तव्य वे कर्त्तव्य हैं जो प्रायः जीवन भर के लिए होते हैं। इसमें वो कर्त्तव्य आते हैं जो किसी रिश्ते, पहचान, या पद पर आधारित होते हैं, जैसे किसी रिश्ते (माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री आदि) के प्रति आपका कर्तव्य, आपके वर्ण के अनुसार आपका कर्तव्य, आपके कुल-आधारित कर्तव्य, और किसी भी ऐसी पहचान के प्रति कर्तव्य जो आपको परिभाषित करती है। इस पर गहराई से विचार करने पर निम्नलिखित बातें सामने आती हैं:
- अपने माता-पिता, परिवार, बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति आपका कर्तव्य आपका अर्ध-स्थायी कर्तव्य है।
- एक संन्यासी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि के रूप में आपका कर्तव्य भी आपका अर्ध-स्थायी कर्तव्य है।
- एक महान दानी, एक दयालु व्यक्ति, एक शांत स्वभाव वाले इंसान, और चरित्र पर आधारित ऐसी ही किसी अन्य पहचान के रूप में आपका कर्तव्य भी आपका अर्ध-स्थायी कर्तव्य है।
ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे यह समझने में मदद मिलती है कि किस प्रकार के कर्तव्य ‘अर्ध-स्थायी’ श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।
स्थायी या निरपेक्ष कर्तव्य
स्थायी या निरपेक्ष कर्तव्य वह कर्तव्य है जिनका पालन एक इंसान या ईश्वर की संतान होने के नाते आपको करना चाहिए। इसके अंतर्गत आपको उन लोगों की रक्षा करनी चाहिए जो आपसे छोटे या कमज़ोर हैं। इसके अंतर्गत आपको सभी जीवों और मनुष्यों के कल्याण की कामना रखते हुए कर्म करने चाहिए। इसके अंतर्गत इस धरती को सभी जीव-जंतुओं और मनुष्यों के रहने के लिए एक बेहतरीन जगह बनाने की प्रवृत्ति भी शामिल है। ये और ऐसे ही कई अन्य कर्तव्य—जिनके लिए आपको किसी विशेष पद या पहचान की आवश्यकता नहीं होती—स्थायी या निरपेक्ष कर्तव्य के उदाहरण हैं।
किस कर्तव्य का पालन करने से परम धर्म होता है?
ऊपर दिए गए विवरणों से, यह स्पष्ट होता है कि अपने स्थायी कर्तव्य को प्राथमिकता देने से मनुष्य परम धर्म के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। ऐसा नहीं है कि आपको अपने अर्ध-स्थायी और अस्थायी कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। उनका पालन करते हुए, आपको बस यह सुनिश्चित करना है कि:
- अर्ध-स्थायी कर्तव्य का पालन करते समय आप अपने स्थायी कर्तव्य की उपेक्षा न करें।
- अस्थायी कर्तव्य का पालन करते समय आप अपने अर्ध-स्थायी और स्थायी कर्तव्यों की उपेक्षा न करें।
अर्थात, सभी मामलों में, यह ध्यान रखना चाइये कि आपका अस्थायी कर्तव्य सबसे कम महत्वपूर्ण है और आपका स्थायी कर्तव्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए आप किसी फ़ूड प्रोसेसिंग कंपनी में काम करते हैं, और आपकी ज़िम्मेदारी कच्चा माल लाने की है। यह आपकी अस्थायी ज़िम्मेदारी है। अब, मान लीजिए आपके परिवार को आपकी ज़रूरत है जो कि आपकी अर्ध-स्थायी ज़िम्मेदारी है, ज़ाहिर है क्योंकि आप ही उनके पालन पोषण और सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार है। इस स्थिति में, यदि कंपनी में आपकी ज़िम्मेदारी आपको अपने परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने से रोकती है, तो आप कंपनी के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को अनदेखा कर सकते है। क्यों? क्योंकि आपका परिवार आपकी अर्ध-स्थायी ज़िम्मेदारी है, और कंपनी आपकी अस्थायी ज़िम्मेदारी है; और हमने ऊपर समझा है कि अस्थायी ज़िम्मेदारी के सामने अर्ध-स्थायी ज़िम्मेदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
आइये एक और स्थिति की बात करते है जो निम्नलिखित में से एक हो सकती है:
- आपकी कंपनी नॉन-वेज फ़ूड-प्रोसेसिंग शुरू करना चाहती है और आपको जानवरों को लाकर उन्हें मारने के काम पर रखती है।
- आपका बेटा किसी महिला का रेप करता है और चाहता है कि आप उसे बचाएँ और पीड़िता के ख़िलाफ़ लड़ें।
पहली स्थिति में, आपका अस्थायी कर्त्तव्य आपको एक इंसान के तौर पर आपका कर्त्तव्य के खिलाफ जाने के लिए मजबूर करता है, जो आपका स्थायी कर्त्तव्य है। (सभी जीवों की रक्षा करना इंसानों के तौर पर हमारा कर्त्तव्य है।) इस स्थिति में, आपकी प्राथमिकता बेगुनाह जानवरों को मारना नहीं बल्कि उनकी रक्षा करना होनी चाहिए, क्योंकि यही आपका स्थायी कर्त्तव्य है।
दूसरे मामले में, पिता के तौर पर आपका जो ‘अर्ध-स्थायी’ कर्त्तव्य है, वह आपसे यह चाहता है कि आप एक इंसान के तौर पर अपने स्थायी कर्त्तव्यके ख़िलाफ़ जाएँ। (किसी महिला का बलात्कार करना मनुष्य के कर्त्तव्य का उल्लंघन है, और किसी बलात्कारी की रक्षा करना भी ठीक वैसा ही है।) इस स्थिति में, आपकी प्राथमिकता अपने बेटे के ख़िलाफ़ लड़ना होनी चाहिए, क्योंकि बलात्कार पीड़िता की रक्षा करना और उसे सहारा देना आपका ‘स्थायी’ कर्त्तव्य है। बलात्कारी को सज़ा दिलवाना भी एक इंसान का ‘स्थायी’ कर्त्तव्य है। इसे पूरा करने के लिए, अगर ज़रूरत पड़े, तो आप पिता के तौर पर अपने ‘अर्ध-स्थायी’ कर्त्तव्य को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।
आइए, अब हम धर्म के दूसरे पहलू ‘न्यायसंगतता’ के बारे में बात करें।
धर्म का सार्वभौमिक न्यायसंगतता पहलू
सार्वभौमिक न्यायसंगतता ही सच्चाई, नैतिकता, नेकी और सबकी भलाई का सार है। इसका तात्पर्य किसी भी स्थिति के सभी पहलुओं को समझकर, हर हाल में सिर्फ़ वही करने से है जो सही हो। फ़ूड-प्रोसेसिंग कंपनी के एक कर्मचारी का ऊपर बताया गया उदाहरण, सार्वभौमिक न्यायसंगतता का ही एक उदाहरण है। उसने सिर्फ़ एक कर्मचारी या पिता के तौर पर अपने कर्त्तव्य तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बेकसूर जानवरों और महिलाओं के प्रति अपने कर्त्तव्य का भी ध्यान रखा। इसी तरह आप बहुआयामी सोच के आधार पर, वही करके जो सभी मनुष्यों और जीवों के हित में हो, अपनी सार्वभौमिक ज़िम्मेदारी निभा सकते हैं।
तो, धर्म का सार यह नहीं है कि आप स्वयं को किसी एक मज़हब, नस्ल, जाति या परिवार तक सीमित रखें। बल्कि धर्म का सार यह है कि आप अपने मन को समस्त संसार के कल्याण के बारे में सोचने के लिए प्रशिक्षित करें, और फिर उसी के अनुरूप कर्म करें।
धर्म का गुण या विशेषता वाला पहलू
किसी भी वस्तु या शरीर के मूल स्वरूप में उसका गुण भी उस जीव अथवा वस्तु का ‘धर्म’ होता है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- यूरेनियम का धर्म रेडियोएक्टिव होना है।
- स्त्री-शरीर का एक धर्म अगली पीढ़ी को जन्म देना है।
- पुरुष-शरीर का एक धर्म अगली पीढ़ी को जन्म देने के लिए स्त्री को बीज प्रदान करना है।
- जल का एक धर्म जीवों की प्यास बुझाना है।
- पृथ्वी का एक धर्म हर चीज़ को अपने केंद्र की ओर आकर्षित करना है।
ये धर्म के ‘गुण या विशेषता पहलू’ के कुछ उदाहरण हैं, और इनके पालन के लिए किसी भी वस्तु या जीव को कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती। धर्म का यह पहलू अपने आप घटित होता है; आप शरीरों या वस्तुओं के इस धर्म को तब तक नहीं बदल सकते, जब तक कि आप उन्हें किसी अन्य वस्तु की मिलावट से दूषित न कर दें।
मनुष्य होने के नाते हमें किस धर्म का पालन करना चाहिए?
मनुष्य को धर्म के गुण या विशेषता वाले पहलू का पालन करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि ये मनुष्य के नियंत्रण से बाहर है, और ये आवश्यक रूप से अपने आप संपन्न होता रहता है। मनुष्य को बुद्धि का उपयोग करके, धर्म के कर्तव्य और न्यायसंगतता पहलू पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यही मानवता, इंसानियत, और मनुष्य धर्म है और यही आपको किसी भी व्यक्ति, वस्तु, आदि के प्रति पक्षपाती हुए बिना सार्वभौमिक कल्याण के लिए निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
धर्म का पालन करना उद्धरणों, नियमों, मज़हबों, आदि को आँख बंद करके मानना नहीं है बल्कि धर्म के पालन के लिए पूर्ण व्यक्तिगत ईमानदारी, स्थिति के सभी पहलुओं की जानकारी, और गहन बुद्धिमता की आवश्यकता होती है। सच में धर्म का पालन करने के लिए:
- आपको निष्पक्ष होकर प्रत्येक स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए।
- अपने अंतर्मन से, अपनी अंतरात्मा से, किसी भी स्थिति पर, ईमानदारी से बात करनी चाहिए, न कि पूर्वाग्रह या अहंकार से।
- कोई भी कार्य किसी व्यक्ति के प्रति भावात्मक लगाव या पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर नहीं करना चाहिए। साथ ही, उस कार्य के परिणाम में, सिर्फ व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ सिद्धि की इच्छा न रखकर सबके (मनुष्यों और जानवरों) कल्याण का ध्यान भी रखना चाहिए।
- डर, लालच, या रिश्तों के प्रति पक्षपाती होकर, या लिखित शब्दों या पुस्तकों में अंध विश्वास रखकर कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए अपने विचारों में स्पष्टता स्थापित करके, अपने स्थायी कर्तव्य को प्राथमिकता देनी चाहिए, और सार्वभौमिक रूप से न्यायसंगत निर्णय लेकर कर्म करना चाहिए। इस प्रकार ही आप धर्म के मार्ग पर चल सकते हैं।
धर्म का अर्थ न तो रिलिजन है और न ही मज़हब।
हम सब को ये आवश्यक रूप से जानना और समझना चाहिए कि:
- रिलिजन धर्म नहीं होता है।
- मज़हब भी धर्म नहीं होता है।
रिलिजन या मज़हब आमतौर पर कुछ निर्धारित नियमों, विश्वास-प्रणालियों, या समुदाय-आधारित अनुष्ठानों का एक मिश्रण होता है। दूसरी ओर, धर्म का मज़हबी नेताओं, मौलवियों, मज़हबी संरचना, और भौतिक या दिखावे की प्रथाओं से कोई लेना-देना नहीं होता है। धर्म कोई नियम पुस्तिका नहीं है बल्कि एक जीवित सिद्धांत है – यह कुछ ऐसा है जिसे बुद्धिमत्ता, ईमानदार विचारों, और विवेक के माध्यम से, स्थिति का आंकलन करके पहचाना जाता है।
जब आपके इरादे शुद्ध होंते हैं और आप निष्पक्षता और निस्वार्थ भाव से निर्णय लेते हैं तभी आप धर्म का पालन कर रहे होते हैं। नियमों का कोई पहले से तैयार किया हुआ संग्रह, यह परिभाषित नहीं कर सकता कि हर स्थिति में क्या सही है। भौतिक संसार बहुत जटिल है, और इसमें धर्म की पहचान प्रासंगिक समझ के बिना नहीं की जा सकती। जो क्रिया या प्रतिक्रिया एक परिस्थिति में सही है वह दूसरी परिस्थिति में गलत हो सकती है। और इसीलिए, धर्म को संहिताबद्ध नहीं किया जा सकता – इसे वर्तमान परिस्थिति का निष्पक्ष आंकलन और विश्लेषण करके ही पहचाना जा सकता है।
धर्म पालन के लिए आपको रूककर गहराई से सोचना चाहिए, पक्षपाती न होकर ईमानदार होना चाहिए, और फिर कार्य करना चाहिए। वास्तविक धार्मिकता इसी प्रकार कार्य करने की प्रवृत्ति है। धर्म सत्य और दिव्यता की नींव है। रिलिजनों, मानव-निर्मित जातियो, षड्यंत्रकारी राजनीति, मज़हबों, और विश्वास प्रणालियों पर आधारित विभाजनों से भरी दुनिया में, हमें धर्म अर्थात सार्वभौमिक न्यायसंगतता के मार्ग पर लौटना चाहिए। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो आपकी सांप्रदायिक या सामुदायिक पहचान से सम्बंधित है बल्कि यह कुछ ऐसा है जो आपके मनुष्य होने और बुद्धिमान होने की पहचान है।
यदि आपके कर्म, आपकी आस्था, या जिन नामों को आप ईश्वर मानते हैं, वे सार्वभौमिक न्ययसंगता (सभी मनुष्यों और जीवों के प्रति न्यायप्रिय होने) के अनुरूप नहीं हैं, तो वे सत्य नहीं हैं। धर्म को अपना मार्गदर्शक बनाइये, न कि रिलिजन या मज़हब, नियम-पुस्तकों, परम्पराओं आदि को। ईमानदारी से सत्य की खोज करें, धर्म की पहचान करें, और उसके अनुसार कर्म करें – वहीं वास्तविक ईश्वर रहता है।
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