जब भी आप बोल सकते थे और चुप रहे। जब भी आपने विवेक की जगह सुविधा को चुना। जब भी आपने खुद को यह समझाया कि कुछ न करना, कुछ करने से बेहतर है — आप ठीक वहीं खड़े थे जहाँ अर्जुन कुरुक्षेत्र में खड़े थे। जमे हुए। उलझे हुए। सैकड़ों कर्तव्यों के शोर में डूबे हुए, जो एक ज़रूरी आवाज़ को दबा रहे थे — परम धर्म की आवाज़। भगवद्गीता का यह छठा श्लोक इस सार्वभौमिक मानवीय संकट को अद्भुत सटीकता से उकेरता है — और श्री कृष्ण का उत्तर आपकी सोचने, निर्णय लेने और कार्य करने की शक्ति को हमेशा के लिए बदल सकता है। इस अवधारणा की गहराई में उतरने के लिए, आइए भगवद्गीता अध्याय 2 के श्लोक 6 से शुरुआत करें:
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।
हिंदी अनुवाद
और हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या बेहतर होगा, हमारा उन पर जीत हासिल करना या उनका हम पर जीत हासिल करना। निश्चित रूप से, मैं धृतराष्ट्र के उन बेटों [और लोगों] को मारने के बाद जीना भी नहीं चाहता, जो [इस युद्ध में] हमारे सामने खड़े हैं।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
इस श्लोक में, अर्जुन अपनी दुविधा बयां कर रहे हैं कि वह यह निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि उनके लिए क्या बेहतर होगा। वह इस असमंजस में हैं कि, असल में, युद्ध जीतना उनके लिए अच्छा होगा या हारना, क्योंकि उन्हें पक्का पता नहीं था कि वे सही के लिए लड़ रहे हैं या गलत के लिए। वह ये तय नहीं कर पा रहे थे कि धर्म (सत्य और न्यायसंगतता) के मार्ग पर चलने के लिए उन्हें अपने किस कर्तव्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।
एक इंसान के तौर पर आपका फ़र्ज़ ही आपका परम धर्म है
अर्जुन अनेक धर्मों (कर्तव्यों), जैसे कि परिवार के प्रति धर्म (कर्त्तव्य), वर्ण-आश्रम धर्म, कुल-धर्म (एक कुल के तौर पर समाज में कर्त्तव्य), पति का धर्म (पति के तौर पर कर्तव्य), आदि को पत्थर की लकीर मानने के कारण ‘परम धर्म’ अर्थात मनुष्य के तौर पर अपने कर्त्तव्य का निर्णय नहीं कर पा रहे थे। ठीक इसी तरह, आज भी मनुष्य विभिन्न धर्मों (कर्तव्यों, दायित्वों और जिम्मेदारियों) से बंधे हुए हैं और उन्हें ही अटल सत्य मानने लगे हैं; परिणामस्वरूप, उनमें से अधिकांश लोग इस बात को लेकर भ्रमित रहते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वे मानव-निर्मित पदों, पहचानों, रिश्तों, आदि से जुड़े इन सभी धर्मों (कर्तव्यों, ज़िम्मेदारियों और जवाबदेहियों) के मूल आधार को कभी समझने की कोशिश नहीं करते।
सभी मानव-निर्मित पदों, पहचानों, रिश्तों, आदि से जुड़े कर्तव्यों (धर्मों) का मूल आधार जीव की ईश्वर-प्रदत्त पहचान होती है; और हमारी ईश्वर-प्रदत्त (प्राकृतिक) पहचान ‘मनुष्य’ होना है। इसलिए, हमें मनुष्य के कर्तव्य को पहचानने, सीखने, और समझने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए—जो कि सभी मनुष्यों और जंतुओं (वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों) के कल्याण के लिए कार्य करना है। इसी के आधार पर धर्म, परिवार, जाति, देश आदि जैसी मानव-निर्मित पहचानों के धर्म (कर्तव्य, ज़िम्मेदारियाँ और जवाबदेहियाँ) तय होते हैं। और याद रखें, यही वह ‘परम धर्म’ है, जिसका प्रतिपादन ईश्वर के मानव-अवतार—श्री कृष्ण—ने भगवद्गीता में किया था; जिसे सामान्यतः ‘सनातन धर्म’ के नाम से जाना जाता है।
बहुआयामी दृष्टिकोण ही आपको धर्म करने के रास्ते पर ले जा सकता है
अर्जुन कहते हैं कि वे यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि जीतना बेहतर होगा या हारना, क्योंकि उन्हें ‘परम धर्म’ (मानव-धर्म) की अवधारणा अस्पष्ट थी। वह सोच रहे थे कि युद्ध जीतने के लिए अपने सगे-संबंधियों को मारना पड़ेगा, जो कि उस परिवार का सदस्य होने के नाते उनका धर्म (कर्तव्य) नहीं है; हाँलाकि वह ये नहीं समझ पा रहे थे कि, क्योंकि उनके कौरव सेना में शामिल परिजन अधर्मी हैं, इसलिए एक इंसान और एक क्षत्रिय होने के नाते, उन्हें हर हाल में पराजित करना, अर्जुन का कर्तव्य था।
अर्जुन के साथ समस्या यह थी कि वह सिर्फ अपने परिवार और गुरुजनों के प्रति अपने कर्तव्य (धर्म) के बारे में सोच रहे थे। वो एक क्षत्रिय और एक इंसान होने के नाते अपने कर्त्तव्य (धर्म) के बारे में नहीं सोच पा रहे थे, जिसके बारे में सर्वोच्च शक्ति के मानव रूप कृष्ण ने उन्हें अवगत कराया।
भगवान ने समझाया कि धर्म का पालन करते समय कोई व्यक्ति केवल एक पक्ष को ध्यान में रखकर काम नहीं कर सकता, उसे उन सभी पक्षों पर ध्यान देना चाहिए जो उसके किसी कार्य या उसकी निष्क्रियता से प्रभावित हो सकते हैं। व्यक्ति को इस बात की पहचान करने के लिए गहन चिंतन करना चाहिए कि किस प्रकार का कार्य या निष्क्रियता वर्तमान और भविष्य की मानव पीढ़ियों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा और कौन सा नहीं। इस चिंतन के दौरान, व्यक्ति का ध्यान सिर्फ इस बात पर नहीं होना चाहिए कि उसे और उसके प्रियजनों को, या उसके सगे-सम्बन्धियों और उसके समुदाय, आदि को क्या लाभ मिलेगा, बल्कि उसका ध्यान इस बात पर भी होना चाहिए कि संपूर्ण ब्रह्मांड अर्थात सभी जीवों की वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए क्या हितकर होगा, और फिर उस व्यापक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य करना चाहिए।

अर्जुन युद्धभूमि में दृढ़ता से खड़े हैं—अपने लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए लड़ते हुए।इसका मतलब यह है कि कोई भी फ़ैसला लेते समय, मनुष्य को सिर्फ़ एक-दो या कुछ सीमित पहलुओं पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उसे उन सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए जिन पर उस फ़ैसले का असर पड़ सकता है। इसी को ‘बहुआयामी सोच’ (multidimensional thinking) कहते हैं। इसका अर्थ है कि मनुष्य की सोच सिर्फ़ कुछ लोगों या जीवों के कल्याण तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे इस धरती पर उपस्थित और भविष्य में जन्म लेने वाले ज़्यादा से ज़्यादा मनुष्यों और जीव-जंतुओं के कल्याण के बारे में सोचना चाहिए।
यही बात श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाई। उन्होंने अर्जुन से कहा कि वह अपने परिवार वालों के बारे में न सोचे, और न ही ये सोचे कि उस युद्ध से उसे क्या मिलेगा। भगवान कहते हैं कि वह भौतिक स्वर्ग या नरक के बारे में भी न सोचे, बल्कि यह सोचे कि आम जनमानस को किस तरह का शासक मिलने वाला है।
कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि अगर वह (अर्जुन) युद्ध नहीं करेंगे, तो बलात्कारी और अत्याचारी लोगों का शासन स्थापित हो जायेगा। इसके विपरीत, अगर वह युद्ध करते हैं, तो वह (अर्जुन) स्वयं जनता का नेतृत्व करेंगे। कृष्ण ने गीता के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि यह युद्ध अर्जुन या पांडवों को सत्ता दिलाने के लिए नहीं था, बल्कि यह उस जनता के कल्याण के लिए था, जिस पर कौरवों या पांडवों में से कोई एक शासन करने वाला था। ज़ाहिर हैं, अगर कौरवों का शासन रहता तो जनता के ‘अधर्म’ की गिरफ्त में जाने की प्रबल सम्भावना थी, जबकि पांडवों का शासन जनता को ‘धर्म’ के साथ, सुख से जीने का अवसर देता।
हांलाकि, अगर अर्जुन केवल कुछ ही पहलुओं—जैसे रिश्तों, नियमों, और परिवार—के बारे में सोचते रहते, तो वह केवल इन्हीं में से कुछ के लाभ के लिए कदम उठाते या फिर इन्ही के लाभ को ध्यान में रखकर कोई भी कदम न उठाते; परंतु जब उन्होंने व्यापक पहलुओं अर्थात आम जनता (वे लोग जिनसे आपका लाभगत, व्यक्तिगत, जातिगत, या साम्प्रदायिक रिश्ता नहीं हैं) के बारे में सोचा, तो उन्होंने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए युद्ध किया।
सभी जीवों के कल्याण के अंतर्गत अधर्मियों का कल्याण नहीं आता।
याद रखें, अर्जुन ने, कृष्ण का मार्गदर्शन प्राप्त होने के बाद, उन लोगों (कौरवों और उनके समर्थकों) के कल्याण के बारे में नहीं सोचा, जो बलात्कारी और अत्याचारी थे, या जो ऐसे अधर्मियों (अन्यायी लोगों) के समर्थक थे। इसलिए, हमें भी धर्म (सार्वभौमिक कल्याण) के लिए कार्य करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि, यदि आप अधर्मी (अन्यायी) लोगों की पहचान ठीक से नहीं कर पाते हैं, तो संभव है कि आप उन्हीं अधर्मियों के कल्याण के लिए काम करना शुरू कर दें—जैसा कि कर्ण ने किया था—और स्वयं भी एक अधर्मी व्यक्ति बन जाएँ।
तो, इस गीता श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कुछ लोगों के आदेशों, किसी विचारधारा, किसी पुस्तक, किसी मज़हब, अपनी पक्षपात पूर्ण भावनाओं, या ऐसी ही किसी अन्य चीज़ का आँख मूँदकर अनुसरण करने के बजाय, उन सभी संभावित पहलुओं पर विचार करना चाहिए, जिन पर हमारे कर्मों का असर पड़ रहा है या पड़ सकता है। इस प्रक्रिया में, हमें इस बात का पर्याप्त ध्यान रखना चाहिए कि हम उन अधर्मियों की सहायता न करें, जो वास्तव में अधार्मिक समूहों और व्यक्तियों का समर्थन तथा संरक्षण करते हैं, भले ही, वे देखने में निर्दोष प्रतीत हो रहे हों।
दिल की भावनाएँ आपको धर्म करने से रोकने की कोशिश करेंगी—उनके जाल में न फँसें!
अर्जुन ने कहा कि वह जीतकर भी जीवित रहना नहीं चाहते, क्योंकि उनका हृदय अपने सगे-संबंधियों के प्रति करुणा से भरा हुआ था। वह सोच रहे थे कि जिन्होंने उसे शिक्षा दी, जिन्होंने उनका पालन-पोषण किया, और जो बचपन में उनके साथ खेले, उन्हें मारने के बजाय, खुद कष्ट सहना बेहतर है। जब उन्होंने युद्ध जीतने के बाद के जीवन को अपनी कल्पना-शक्ति से देखा, तो पाया कि उसके कुल के अधिकतर सदस्य मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। अतीत की ये सारी यादें और भविष्य की ये कल्पनाएँ उन्हें दुखी कर रही थीं। ऐसी भावनाओं को ही ‘हृदय की भावनाएँ’ कहा जाता है, क्योंकि जब ये उत्पन्न होती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे हृदय (दिल) भारी हो गया है या उसकी धड़कनें रुकने वाली हैं।यही वे भावनाएँ थीं जो अर्जुन को धर्म के इस युद्ध को लड़ने से रोक रही थीं। यही भावनाएँ हमें भी जीवन के हर मोड़ पर धर्म का पालन करने से रोकती हैं।

भावनाएँ दुश्मन नहीं हैं—नियंत्रण खोना घातक है।याद रखें, अधर्मी (अन्यायी) लोगों में ऐसी भावनाएँ नहीं होतीं, और इसलिए, वे धार्मिक और निर्दोष लोगों को मिटाने का काम बहुत कुशलता से करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक लोगों में भी ऐसी भावनाएँ नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि उन्हें इन भावनाओं के वश में नहीं होना चाहिए; उन्हें इन भावनाओं का उपयोग यह समझने के लिए करना चाहिए कि कब और कैसे कार्य करना है, और कब और क्या नहीं करना है। इसलिए, अर्जुन को भावनाओं के इस जाल से मुक्त करने के लिए, श्री कृष्ण ने उन्हें सांख्ययोग या ज्ञानयोग (मानव अस्तित्व का पूर्ण ज्ञान) का उपदेश दिया। हम इस अध्याय के आने वाले श्लोकों में इसके बारे में जानेंगे, इसलिए हमारे साथ बने रहें!







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