भगवद गीता के इस श्लोक में, करुणा से भरे हुए अर्जुन, कृष्ण से कहते हैं कि वह अपने बड़ों और गुरुजनों की हत्या करने के बजाय भीख मांगकर खाना अधिक पसंद करेंगे। हम अर्जुन के इस दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करेंगे। हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि वह ऐसा क्यों सोचते थे, और ऐसी दुविधा की स्थितियों में किसी भी व्यक्ति को क्या करना चाहिए। हम आज की दुनिया के उदाहरणों का उपयोग करके “खून से सने हुए भोगों” के अर्थ को भी विस्तार से समझेंगे। आइए, भगवद गीता के अध्याय 2 के संस्कृत श्लोक 5 के साथ शुरुआत करें।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||
हिंदी अनुवाद
गुरुओं (शिक्षकों) को न मारकर, इस दुनिया में भिक्षा पर जीना, महान आत्माओं (धार्मिक मनुष्यों) के लिए श्रेयष्कर होता है। गुरुजनों को मारकर, मैं यहां रक्त-रंजित अर्थ-काम रूपी भोग ही भोगूंगा।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
यहां, अर्जुन एक बेहतरीन विचारधारा का पालन कर रहे हैं लेकिन वे कुछ ज़रूरी बातों को नज़रअंदाज़ भी कर रहे हैं। वे ये तो बिल्कुल सही कह रहे हैं कि:
“अपने व्यक्तिगत फायदे, व्यक्तिगत खुशी, और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अपने बड़ों, शिक्षकों, या किसी और को भी मारना सही नहीं है।”
लेकिन अर्जुन ये बात भूल रहे थे कि भगवान ने, उन्हें, उस युद्ध में, अपनी (अर्जुन की) निजी ज़रूरतें पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि अधर्मी लोगों से राज्य छीनने के लिए लगाया था। यह युद्ध न तो पांडवों के लिए था और न ही कौरवों के खिलाफ, यह तो अधर्म के राज को कुचलकर, धर्म का राज स्थापित करने के लिए था।
श्लोक के दूसरे भाग में कहा गया है कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी की हत्या करना, खून में सने हुए भोजन और ऐशो-आराम का भोग करने जैसा होगा। आइए इसका मतलब समझते हैं।
खून से सनी हुई जीवन यापन और ऐशो-आराम की वस्तुओं से क्या तात्पर्य है?
वे चीजें खून से सनी हुई होती हैं जो किसी व्यक्ति, परिवार, कुछ लोगों, समुदाय आदि के आनंद के लिए किसी मासूम, निर्दोष जीवित प्राणी की हत्या करके प्राप्त की गई हैं। इसमें वह सब कुछ शामिल है जो आप किसी भी निर्दोष मनुष्य, जानवर, आदि को मारकर प्राप्त करते हैं।
इसका एक उदाहरण, किसी के द्वारा, किसी धार्मिक अर्थात सभी नागरिकों की भलाई सुनिश्चित करने वाले और मासूम जीवों को प्रताड़ित न करने वाले राजा (देश के मुखिया) को मारकर हासिल की गयी सत्ता हो सकती है। ऐसी सत्ता खून से सनी हुई सत्ता है। यह बहुत बड़ा अन्याय है। ये पक्का अधर्म है। इसके विपरीत, अगर राजा या शासक अपने पद का नाजायज़ फायदा उठा कर मासूम लोगों का शोषण कर रहा है, तो उसे मारना धर्म का काम हो सकता है, बशर्ते मासूम मनुष्यों की भलाई के लिए यही एक रास्ता बचा हो। हालांकि, ऐसा करते समय, बहुत बारीकी से ये देखना, समझना, और पहचानना चाहिए कि क्या शासक सच में अधर्मी है और क्या उसके खिलाफ लड़ने वाला सच में धार्मिक है। हमें देखना होगा कि:
- कहीं ऐसा तो नहीं कि राजा या देश के मुखिया का विरोध करने वाला, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ या मज़हबी उन्मत्तता और कट्टरता को संतुष्ट करने के लिए युद्ध कर रहा है।
- कहीं वह समाज में बुराई या उसके बीजारोपण को बढ़ावा देने वाला तो नहीं है।
- ये जो राजा के विरुद्ध युद्ध कर रहा है, ये राज्य के प्रत्येक नागरिक के हक और भलाई का ध्यान रखने वाला हो, न कि सिर्फ कुछ मानव निर्मित जातियों या मज़हबों के लोगों की भलाई चाहने वाला।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना और सत्यमार्गी राजा या नेता को पहचानना उतना आसान नहीं है जितना यहां लिखा गया है, इसके लिए आपको बहुत ही समझदारी से निर्णय लेने की ज़रूरत होती है। आइए इसे आज के भारत (2014-2026) के एक उदाहरण से समझते हैं।
नरेंद्र मोदी – एक मज़हब के आधार पर पक्षपात करने वाला नेता या एक बुद्धिमान धार्मिक नेता?
वर्तमान (2014-2029) समय में, भारत के प्रधानमंत्री मज़हबों के बारे में बहुत बात करते हैं, और यह रिलीजियस ध्रुवीकरण, उन्हें चुनाव जीतने में काफी मदद भी करता है। चुनाव प्रचार के दौरान वह जो बयान देते हैं, उससे ऐसा लगता है कि उनका झुकाव सिर्फ उन हिंदुओं (भारतीयों) की तरफ है जो अभी भी खुद को हिंदू मानते हैं, और वह उन हिंदुओं (भारतीयों) से नफरत करते हैं जो खुद को अरबी मानते हैं। बहुत से लोग कहते हैं कि वह उन सभी हिंदुओं (भारतीयों) को खत्म करना चाहते हैं जिन्होंने अरब या पश्चिमी संस्कृतियों और मज़हबों को अपना लिया है। मुझे उनकी बातें सुनने और उनके काम करने के तरीके को देखने के बाद, यह दावा सच नहीं लगता क्योंकि मैंने उन्हें कभी मज़हबी गुलामों को खत्म करने के लिए काम करते नहीं देखा, वह बस चाहते हैं कि सभी भारतीय खुद को उस ग़ुलामी के बंधन से आज़ाद करें और मानसिक रूप से स्वतंत्र बनें।

नरेंद्र मोदी का, उनके 'नए भारत' की संकल्पना के साथ एक प्रतीकात्मक चित्रण।उनका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी हिंदू (भारतीय) अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े रहें क्योंकि हमारा प्राचीन (अंग्रेज़ों, मुग़लों, और जातिवाद से पहले का) इतिहास धर्म (सभी की भलाई के लिए काम करना) पर आधारित है। और इस इतिहास से सभी भारतीयों को जोड़े रखने में निम्नलिखित कार्य काफी कारगर साबित हो सकते हैं:
अपने लोगों को भारत के प्राचीन, मानवता पर केंद्रित इतिहास से अवगत कराएँ।
अपने नागरिकों को रामायण, महाभारत, शिवपुराण, भगवतपुराण आदि पढ़ाकर भारत के प्राचीन इतिहास से अवगत कराएं। हालांकि कई इतिहासकार इसे इतिहास नहीं मानते क्योंकि उनकी समय और विचारों की कल्पना आधुनिकता में संकुचित होकर रह गयी है, वे एक तरह से आधुनिक रूढ़िवादिता के शिकार हो चुके हैं, इसलिए उन्हें बेवकूफ समझकर नज़रअंदाज़ करें और आने वाली पीढ़ियों में प्राचीन भारतीय मूल्यों पर आधारित बुद्धिमता, जो समावेशी, मानवता-केंद्रित, और सर्व-जनकल्याण पर केंद्रित होती है, उसको विकसित करने के लिए कार्य करें।
लोगों को हमारे उन सच्चे नायकों का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करें, जिन्होंने निर्दोषों से प्रेम किया और अधर्मियों से नफ़रत।
अपने नागरिकों को अपने इतिहास के नायकों और ईश्वर के मानव रूपों जैसे श्री राम, श्री कृष्ण, महादेव आदि का स्मरण कराएं, क्योंकि अगर वे इन्हे याद रखेंगे, तो उनके इन नायकों की सृष्टि-कल्याण पर केंद्रित शिक्षाएं याद रखने की संभावना भी बढ़ जाएगी। इसीलिए नरेंद्र मोदी और कई दूसरे महान राजाओं ने इन नायकों के मंदिर बनाने और उनकी मूर्तियां लगाने पर ध्यान दिया था। इससे आने वाली पीढ़ियों को इन नायकों के रूप और चरित्र को अपनी स्मृति में रखने और खुद को भी उनकी तरह (सृष्टि-कल्याण के लिए सोचने और कार्य करने वाला) बनाने में मदद मिलती है। और वैसे भी, जब भगवान इंसान के रूप में धरती पर आते हैं, तो हमें उनकी लीलाओं को नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने यह सब धर्म (सभी मनुष्यों और जीवों की भलाई) को स्थापित करने के लिए किया था।
अपने लोगों को अपनी, सभी के कल्याण पर क्रेंद्रित, संस्कृति का सम्मान करना सिखाएँ।
अपने नागरिकों को अपनी धार्मिक (सबके कल्याण पर क्रेंद्रित) संस्कृति और प्राचीन धर्म-प्रेरक इतिहास का सम्मान करने के लिए प्रेरित करें। भारतीयों के दिमाग में काफी समय तक ये डाला गया कि भारत (या इंडिया या भारत में इंसानी आबादी) 1947 के बाद या कुछ हज़ार साल पहले बना है, जो कि सच नहीं है। यह लाखों सालों से है, और लाखों सालों का वह इतिहास भी हमारा अपना इतिहास ही है, और उस इतिहास को याद रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि वह हमें सही अर्थों में सबकी भलाई सिखाता है। हमें अपने पूर्वजों द्वारा प्रदर्शित की गई सर्वोत्कृष्ट बुद्धिमत्ता और ज्ञान को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। राम, कृष्ण और महादेव हमारे पूर्वज हैं और उनके समझदारी भरे (सर्व-जन हिताय, सर्व जन सुखाय पर आधारित) कामों को उनके समय में ही रामायण, महाभारत, भगवद्गीता और पुराणों जैसे ग्रंथों में लिखा गया है। हमारे पूर्वज अत्रि, अगस्त्य, वेद व्यास, वाल्मीकि वगैरह भी थे, जिन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद से ज्ञान प्राप्त किया था। हमें अपने लोगों को इतिहास की इन किताबों का सम्मान करना भी सिखाना चाहिए ताकि वे इन निःस्वार्थ कर्म करने की शिक्षा देने वाली पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित हो सकें, और स्वार्थी बनने से बच सकें।
इन सभी पहलुओं पर ध्यान देते हुए, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इन ऐतिहासिक विभूतियों से जुड़े स्मारक और मंदिर बनाए, और अलग-अलग तरीकों से प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रचार-प्रसार के लिए और भी कार्य किए। उनका मानना है कि मंदिर कहे जाने वाले ये स्मारक, आने वाली पीढ़ियों को यह सोचने के लिए प्रेरित करेंगे कि ये लोग कौन थे, और उन्हें जानने के लिए, वे हमारे प्राचीन और बुद्धिमान इतिहासकारों, जिन्हें भारत में औपचारिक रूप से ऋषि-मुनि के नाम से जाना जाता है, उनकी लिखी किताबों को पढ़ेंगे। इन किताबों को भारत में धर्म ग्रंथ के नाम से जाना जाता है और इनमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञान होता है, और ये पुस्तकें अपने पढ़ने वालों को बुद्धिमत्ता, तार्किकता, और धर्म (सबके कल्याण की सोच) से भर देंगी।
तो, अगर भारत की 10% आबादी भी इन ग्रंथों का अध्ययन करे और इनका असली अर्थ और मर्म समझे, तो ये 10% भी दुनिया को रहने के लायक बनाये रखने के लिए काफी होंगे। लेकिन अगर भारत की 100% आबादी इन ग्रंथों के ज्ञान और मर्म को प्राप्त कर ले, और उसके अनुसार आचरण करने लगे, तो दुःख और बुराई का नामोनिशान मिट जायेगा।
मोदी जी, जो अभी (2014-2029) के भारत में असली क्षत्रिय धर्म का पालन कर रहे हैं, उनका यही लक्ष्य है। लेकिन, अब सवाल उठता है कि नरेंद्र मोदी इतना हिंदू/मुस्लिम विवाद क्यों करते हैं। आइए इस पहलू पर भी एक नज़र डालते हैं।
नरेंद्र मोदी देश के राजनीतिक मुकाबलों अर्थात चुनाव में इतना हिंदू-मुस्लिम क्यों करते हैं?
हमने पहले बात की थी कि नरेंद्र मोदी मंदिरों और प्राचीन भारतीय (हिंदू) इतिहास और संस्कृति को बहुत महत्व देते हैं। हमने चर्चा की थी कि वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि भारतीय अपने समृद्ध इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को याद रखें। हमने यह भी चर्चा की थी कि वे चाहते हैं कि भारतीय इसे इसलिए याद रखें क्योंकि इससे उनकी बुद्धि का विकास होगा, और वे सार्वभौमिक कल्याण के साधक बन जाएँगे।
तो, लोगों को महान बनाने के लिए उनके पास एक अच्छी योजना है, जिसके द्वारा वह, लोगों को, भारतीय पूर्वजों से मिली ज्ञानवर्धक सामग्री से जुड़कर, ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन, इस योजना को सफल बनाने के लिए, इसे अमल में लाना ज़रूरी है, और यह तभी संभव होगा जब नरेंद्र मोदी के पास सत्ता होगी। सत्ता पाने के लिए उन्हें चुनाव जीतना होगा, जो लोगों के वोटों से ही संभव है। लेकिन लोग (मतदाता) आपको सिर्फ़ आपकी “सबका साथ, सबका विकास” की राजनीति के लिए वोट नहीं देते; वे चाहते हैं कि आप उनके अंदर मौजूद विकारों को भी संतुष्ट करें। उनके अंदर लालच, ईर्ष्या, अहंकार, भय जैसी बुराइयाँ होती हैं, जिन्हें अक्सर वे राजनेता संतुष्ट करते हैं जो स्वार्थी होते हैं, क्योंकि उन्हें राष्ट्रव्यापी कल्याण की कोई परवाह नहीं होती। चूँकि, ये अधर्मी राजनेता मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए, उनकी इन्हीं बुराइयों में से किसी एक या कई का फायदा उठाते हैं, इसलिए मोदी को भी वैसे ही किसी हथियार की आवश्यकता होती है। और उनका हथियार है असली भारतीयों का ध्रुवीकरण, जिसके ज़रिए वे अपने विरोधियों को हराते हैं और साथ ही हिंदुओं (असली भारतीयों) को एकजुट भी करते हैं। इस तरह वह एक ही तीर से दो निशाने लगाते हैं।
तो, नरेंद्र मोदी और उनके विरोधी—दोनों ही चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं के अंदर के विकारों (लालच, ईर्ष्या, अहंकार, भय आदि) का फायदा उठा रहे हैं। बस फर्क इतना है कि नरेंद्र मोदी मानव निर्मित जातियों में बंटे हिंदुओं को एकजुट करते हैं ताकि वे ध्रुवीकृत होकर उन्हें वोट दें और उनके विरोधी, हिंदुओं को उपनाम या कुल-आधारित जातियों में बाँटकर मुसलमानों को एकजुट करते हैं, ताकि वे भी ध्रुवीकृत होकर उन्हें वोट दें। अगर हम दोनों की तुलना करें, तो हम पाते हैं कि नरेंद्र मोदी अब भी बेहतर काम कर रहे हैं, क्योंकि वे किसी को बाँट नहीं रहे, बल्कि सिर्फ़ हिंदुओं को एकजुट कर रहे हैं।
चूँकि, विरोधी नरेंद्र मोदी को हराने के लिए ‘मुस्लिम-जाति-मुस्लिम’ की रणनीति अपनाते हैं, इसलिए उन्हें भी चुनाव जीतने के लिए ‘हिंदू-मुस्लिम’ की रणनीति अपनानी पड़ती है। अब, यह सवाल उठ सकता है कि जब नरेंद्र मोदी भी वोट पाने के लिए दूसरों जैसी ही चालें चलते हैं तो मैं उनका समर्थन क्यों करता हूँ। मेरा जवाब यह है:
नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक रूप से पक्षपाती नेता दिखते हैं पर वो जातिगत भेदभाव और पक्षपात के विरुद्ध एक योद्धा हैं।
नरेंद्र मोदी और उनके विरोधियों में यही फ़र्क है कि मोदी जी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण इसलिए करते हैं ताकि उन्हें वर्तमान और भावी भारतीय पीढ़ियों की भलाई के लिए काम करने का मौका मिल सके, जबकि उनके विरोधी नेता ऐसा इसलिए करते हैं ताकि उन्हें अपना, अपने परिवार, और अपने प्रियजनों का निजी स्वार्थ सिद्ध करने का और वर्तमान और भावी भारतीय पीढ़ियों को प्राचीन भारत के इतिहास, ज्ञान, और बुद्धिमता से दूर रखने का मौका मिल सके।
तो, नरेंद्र मोदी की इस कहानी से यह सीख मिलती है कि हमें किसी इंसान का विरोध सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि वह कुछ ऐसा कहता है जो सही नहीं लगता, बल्कि हमें यह भी देखना चाहिए कि वह जो करता है वह सही है या गलत। अगर वह कुछ सांप्रदायिक या ग़ुलाम, या बुरे या मूर्ख लोगों का समर्थन पाने के लिए कुछ ऐसा कहता है जो सही नहीं है, लेकिन करता वही है जो पक्षपात रहित है और सभी के लिए कल्याणकारी है, तो हमें ऐसे राजा, नेता, या देश/राज्य के मुखिया का साथ देना चाहिए। इसके विपरीत, कोई नेता चाहे बहुत बातें अच्छी करता हो या बहुत बुरी बातें करता हो, अगर उसकी कार्य नीति पक्षपात पूर्ण और कुछ लोगों के तुष्टीकरण पर केंद्रित है, तो हमें उसकी बातों में नहीं फंसना चाहिए। हमें उसके असली लक्ष्य को पहचानना चाहिए, और उसी के हिसाब से फैसला लेना चाहिए। हालांकि, धर्म के हिसाब से काम करने और फैसले लेने के लिए आपको स्वयं को बुद्धिमान तथा मनुष्यों, कर्मों, और इरादों का सटीक परीक्षण कर सकने वाला बनाना होगा, क्योंकि सभी संभावित परिस्थितियों के लिए नियम नहीं लिखे जा सकते। हां, भगवद्गीता में बताये गए सिद्धांतों का अध्ययन और उनका चिंतन करके आप अपनी सही फ़ैसले लेने की क्षमता ज़रूर बढ़ा सकते हैं और धर्म (सबका कल्याण) के रास्ते पर चल सकते हैं।
तो यह एक उदाहरण था कि कभी-कभी यह पहचानना कितना मुश्किल हो सकता है कि कोई इंसान सही है या गलत। इसलिए, किसी राजनेता का समर्थन या विरोध करने से पहले, सभी पहलुओं का बारीकी से परीक्षण करें और स्वयं को निष्पक्ष रखते हुए यह पहचाने कि वह सही है या गलत।
ऊपर बताये गए सभी पहलुओं को देखकर यह पहचानना बहुत आसान हो जाता है कि नरेंद्र मोदी अपनी थाली में ऐसा कुछ नहीं ला रहे हैं जो खून से सना हो, बल्कि वह हर भारतीय इंसान में धर्म (सभी जीवों के कल्याण की भावना) स्थापित करने के लिए सब कुछ कर रहे हैं। हमने देखा है कि जब वह मज़हबों के बारे में बहुत बात करते हैं तो अपनी बातों के अनुसार काम नहीं करते, लेकिन जब वह धर्म (सबकी भलाई) के बारे में बात करते हैं तो वह अपनी बातों के अनुसार ही कार्य करते हैं।
आइये अब खून से सने हुए भोगों के एक और उदाहरण को देखते हैं।
जानवरों को मारकर प्राप्त भोजन खाना
जिस भोजन में जानवर का मांस होता है, वह भी खून से सना हुआ भोग है। खून से सना होने का मतलब यह नहीं है कि उसे खून से भरी बाल्टी में ही डुबोया गया हो, बल्कि इसका मतलब है कि यह पक्का अधर्म (अपनी इच्छा पूर्ति के लिए मासूमों पर अत्याचार) है। यह पक्का अधर्म इसलिए है क्योंकि यह भोजन उन्हें मारकर प्राप्त किया गया है जो न तो किसी को नुकसान पहुंचा रहे हैं और न ही किसी को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।
यद्यपि हमने ‘खून से सने हुए भोगों’ के सिर्फ़ दो उदाहरण बताए हैं, लेकिन वे सिर्फ़ इन्हीं दो तक सीमित नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति, निष्पक्ष रहकर, बुद्धिमानी से चिंतन करके इस प्रकार के भोगों की पहचान कर सकता है। याद रखें, अगर आप अपने व्यक्तिगत मज़े या सांप्रदायिक/मज़हबी कट्टरता के लिए किसी को मारते हैं तो उससे प्राप्त हर व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भोग, और भावनाएं, सभी खून से सने हुए होंगे। इसके विपरीत, धर्म (जाति, पंथ, नस्ल, मज़हब, आस्था, आदि के भेदभाव से रहित होकर सबकी भलाई की नीति) को स्थापित करने के लिए, किसी को भी मारने से न कोई पाप लगता है और न ही उससे प्राप्त कोई भी भोग खून से सना होता है।








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