भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 7 से 10 की व्याख्या: अर्जुन की दुविधा और मौन

दो सेनाओं से घिरे हुए, हाथों में धनुष लिए, और आँखों में आँसू लिए हुए, अर्जुन ने कृष्ण की ओर देखा। उन्होंने एक अत्यंत मानवीय बात स्वीकार की: “मैं भ्रमित हूँ। मैं कमज़ोर हूँ। मुझे इस पीड़ा से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। कृपया मुझे बताएँ कि सही क्या है। मैं आपका शिष्य हूँ।” भगवद गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 7, 8, 9 और 10 अर्जुन की यात्रा के सबसे सच्चे और निश्छल क्षण को दर्शाते हैं। वह अपनी कमज़ोरी स्वीकार करते हैं। वह मानते हैं कि उनकी भावनाएँ उन पर हावी हो गई हैं। वह स्वयं को समर्पित कर देते है। और ऐसा करके, वह मानव इतिहास में दर्ज सबसे अधिक परिवर्तनकारी ज्ञान का द्वार खोल देते हैं, जिसे भगवान कृष्ण का ‘सांख्य योग’ कहा जाता है। कृष्ण की शिक्षाओं को ग्रहण करने से पहले, आइए गीता के श्लोक 2.7 से अर्जुन की मनोदशा को समझें।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: |
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || 7||

हिंदी अनुवाद:

[हृदय और मन में] कायरता तथा भ्रम के दोषों (विकारों) से ग्रस्त स्वाभाव वाला मैं, आपसे अपने धर्म (कर्तव्य) के विषय में पूछ रहा हूँ। कृपया मुझे बताएँ कि मेरे लिए निश्चित रूप से क्या करना उचित है; मैं आपका शिष्य हूँ और आपके समक्ष शरणागत हूँ।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

श्लोक 2 और श्लोक 3 में, श्री कृष्ण ने अर्जुन के व्यवहार को ‘अनार्यों’ (धर्मयुक्त आचरण न करने वाला) जैसा बताया, जिसका कारण परिवार के प्रति उनका अत्यधिक मोह था जो उन्हें (अर्जुन को) भीतर से कमज़ोर कर रहा था। कृष्ण ने उनसे यह भी कहा कि वह नपुंसक जैसा व्यवहार न करे—जिसकी हमने ‘भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 3‘ वाले पृष्ठ पर विस्तृत व्याख्या की है। श्री कृष्ण के ऐसा कहने पर, अर्जुन को यह एहसास हुआ कि उनका व्यव्हार धर्मआचरित सत्पुरुषों जैसा नहीं था। इसलिए, अर्जुन ने, कृष्ण से, उस कठिन परिस्थिति में सही मार्ग दिखाने का अनुरोध, यह पूछते हुए किया कि उन्हें क्या करना चाहिए।  ऐसा करते हुए उन्होंने यह स्वीकार किया कि शारीरिक (हृदय और मन से जुड़ी) भावनाओं पर आधारित भ्रम के कारण, वह कायरों जैसा व्यव्हार कर रहे थे।

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || 8||

हिंदी अनुवाद:

मुझे निश्चित रूप से ऐसा कोई उपाय नज़र नहीं आता, जिससे इस पीड़ा का अंत हो सके जो मेरी इंद्रियों को सुखाए जा रही है (मुझे व्याकुल कर रही है)। भले ही मुझे पूरी पृथ्वी का शत्रु-मुक्त और सर्व-समृद्ध राज्य मिल जाए, या फिर स्वर्ग के देवताओं (वे पवित्र आत्माएँ, जो ब्रह्मांडों को सुचारू रूप से चलाने के लिए ईश्वर की ओर से कार्य करती हैं) का आधिपत्य ही क्यों न प्राप्त हो जाए।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

अर्जुन ने कृष्ण से आगे कहा कि वे भावनाएँ इतनी प्रबल थीं कि वे उन्हें अत्यधिक व्याकुल कर रही थीं और युद्ध लड़ने से रोक रही थीं। उन्होंने कहा कि पूरी पृथ्वी और उससे भी परे के साम्राज्य का स्वामित्व प्राप्त कर लेने की सम्भावना के बाद भी, उनका मन यह युद्ध लड़ने की गवाही नहीं दे रहा था। यदि हम उनकी स्थिति पर थोड़ा गहराई से विचार करें, तो हम पाएँगे कि कई बार हम भी केवल कुछ व्यक्तिगत, मज़हबी, सांप्रदायिक, नफरती आदि भावनाओं के कारण सही मार्ग नहीं चुन पाते हैं। इसलिए, हमें भी उन श्लोकों का अध्ययन और चिंतन करना चाहिए जो कृष्ण ने अर्जुन से कहे, ताकि हम भी ऐसी भावनाओं और विचारों का गुलाम बनने से स्वयं को बचा सकें, जो हमें सही कार्य करने से रोकते हैं।

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥9॥ 

हिंदी अनुवाद:

संजय ने कहा:
हृषीकेश (श्री कृष्ण) से यह सब कहने के बाद, शत्रुओं को दंड देने वाले गुडाकेश (अर्जुन) ने गोविंद (कृष्ण) से आगे कहा कि वह युद्ध नहीं करेंगे, और फिर वह मौन हो गए।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

तो कृष्ण को अपनी भावनाओं के बारे में इतना कुछ बताने के बाद, अर्जुन—जो धर्म (मानवता) के शत्रुओं का नाश करने वाले के रूप में जाने जाते थे—रथ पर वापस बैठ गए। उन्होंने लड़ने से साफ़ मना कर दिया और उसके बाद कुछ नहीं कहा। वह अपनी सारी व्यथा कहकर चुपचाप भगवान कृष्ण के ऊपर सब छोड़ कर बैठ गए, इसी को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण कहा जाता है। जब आपकी भावनाएँ, परंपराएँ, और विचारधारा इतनी ताकतवर हो जाए कि वो आपको सही काम करने से रोकने लगें, तो स्वयं को ईश्वर के समक्ष समर्पित कर देना चाहिए।

कुरुक्षेत्र में, अर्जुन रथ पर सिर झुकाए मौन बैठे हैं। भगवान कृष्ण शांत भाव से उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। यह चित्र पूर्ण समर्पण, आंतरिक शांति और ईश्वर में आस्था को दर्शा रहा है।
सच्चा समर्पण तब शुरू होता है, जब जीव मन को शांत करके ईश्वर से योग करने की चेष्टा करता है।

और याद रखें, ईश्वर के प्रति समर्पण का मतलब सिर्फ़ यह कहना नहीं है कि मैं नहीं लड़ूँगा, बल्कि ईश्वर जो कहते हैं, उसका पालन करना है। और ईश्वर चाहते हैं कि आप सबसे पहले, अपने बारे में सोचना बंद करके, अपनी इन भावनाओं, परंपराओं और विचारधाराओं से स्वयं के मन-मष्तिष्क को स्वतंत्र करें; और जब आप इन शत्रुओं से छुटकारा पा लेंगे, तो वे आपको अधर्म के विरुद्ध लड़ने से नहीं रोक पाएँगे। और, इन शत्रुओं को हराने के लिए ही, श्री कृष्ण ने अर्जुन को ‘भगवद् गीता’ के रूप में सांख्ययोग और कर्मयोग का उपदेश दिया। इसलिए, इस महानतम ग्रंथ का अध्ययन करें और जीवन जीने के लिए कृष्ण द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन करें—यही ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है।

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥

हिंदी अनुवाद:

हे भारतवंशी (धृतराष्ट्र), ऋषिकेश (श्री कृष्ण) ने तब दोनों सेनाओं के मध्य में, उस हताश भारतवंशी (अर्जुन) से, मुस्कुराते हुए, ये शब्द कहे।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

तब संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि श्री कृष्ण ने अर्जुन से ये शब्द कहे। वे शब्द क्या थे? वे सांख्य योग का ज्ञान थे, जिसे हम भी भगवत गीता के दूसरे अध्याय के आने वाले श्लोकों में पढ़ेंगे और उनसे सीखेंगे।

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