नर्क, अहिंसा, आत्मरक्षा, और धर्मयुद्ध का सही मतलब: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय -1, श्लोक – 44 से 47

श्लोक – 44
उत्सन्नकुलधर्माणं मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥

हिंदी अनुवाद:

हे जनार्दन! (कृष्ण!) मैंने सुना है कि जिस मनुष्य के कुलधर्म नष्ट हो गए हैं (अर्थात जिन्हें करना बंद कर दिया है), वह हमेशा के लिए नरक में निवास करता है।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

अर्जुन ने कहा कि जब इंसान अपने कुल-धर्म (समाज के लिए उसके पूर्वजों द्वारा निभाए जाने वाले न्यायसंगत कर्तव्य) का पालन करना बंद कर देते हैं, तो वे हमेशा के लिए नरक में रहते हैं अर्थात नारकीय जीवन जीते हैं। ऐसा क्यों होता है? पुराने समय में ऐसा क्यों कहा गया था?

जो मनुष्य अपने कुल-धर्म का पालन नहीं करते, वे नरक में क्यों जाते हैं?

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब आपको नहीं पता होता कि आपके पूर्वज मनुष्य होने के नाते, समाज और सृष्टि की भलाई को ध्यान में रखते हुए किस कार्य में संलग्न थे, तब आपके गलतियाँ करने की संभावना बढ़ जाती है। और वो गलतियां धीरे धीरे आपकी आदत बन जाती हैं और आपके दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। और जब आप नियमित रूप से गलत (अधार्मिक) काम करने लग जाते हैं, तो आपकी ज़िंदगी नरक बन जाती है। यद्यपि, आपको शुरू में इसका एहसास नहीं होता है। और हाँ, अगर आप पूरी तरह से बुद्धिहीन हैं और आपकी सोचने-समझने की क्षमता बहुत कम है, तो हो सकता है कि आपको इस बात का एहसास कभी न हो। हाँलाकि, आप के नरक में होने की पुष्टि आपका तनाव में होना, आपका दुखी होना, आपका अहंकारी होना, आपका दूसरों के प्रति नफरत रखना, आपका बुराई करने वालों और कट्टर सोच वालों के प्रति मानवता का हवाला देकर संवेदना रखना, और आपका किसी न किसी की शिकायत करते रहना, आदि लक्षण करते रहते हैं। यही असली ज़िंदगी का नरक है।

मरने के बाद की स्थिति में भी, आप नरक में ही रह रहे होंगे क्योंकि श्री कृष्ण द्वारा समझाया गया कर्मफल का सिद्धांत यही बताता है।

श्लोक – 45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् |
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ||

हिंदी अनुवाद:

हाय! हम सिर्फ़ राज-पाट के सुखों के लालच में अपने ही बंधुजनों को मारने जैसा बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

कौरवों से लड़ने का फैसला गलत था, यह सिद्ध करने के लिए ये सभी तर्क देने के बाद, अर्जुन ने कहा कि सिर्फ़ ऐशो-आराम और राज-पाट के लालच में अपने ही रिश्तेदारों को मारने के लिए तैयार होना बहुत दुख की बात है। वह कुछ हद तक सही थे क्योंकि किसी भी तरह के लालच के लिए किसी को भी मारना (सिर्फ़ रिश्तेदारों को ही नहीं) अधर्म है, लेकिन किसी अधर्मी राजा से राज-पाट छीनने के लिए उसे मारना धर्म है, बशर्ते आपका इरादा उस राज्य में सभी जीवों की भलाई के लिए काम करना हो। याद रखें, राज-पाट राजा का अधिकार नहीं होता, बल्कि उसकी ज़िम्मेदारी होती है।

श्लोक – 46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: |
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ||

हिंदी अनुवाद:

यदि धृतराष्ट्र के शस्त्र सज्ज बेटे युद्ध के मैदान में मुझे तब मार देते हैं जब मैं शस्त्ररहित हूँ और प्रतिकार न कर रहा हूँ, वह भी मेरे लिए अच्छा होगा।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

इस श्लोक में अर्जुन ने कहा कि अगर हथियारबंद कौरव मुझे पलटवार न करने पर और निहत्थे होने पर भी मार दें, तो भी मुझे अच्छा ही लगेगा।

यहाँ और पिछले श्लोक में, अर्जुन धर्म (कर्त्तव्य) का पालन करने के बजाय, समाज द्वारा बनाए गए कुछ नियमों पर चलने की कोशिश कर रहा था। आज भी लोग यही करते हैं, क्योंकि आम तौर पर उन्हें खुद पर भरोसा नहीं होता और वे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि वे सिर्फ दूसरों के द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करते हैं। आइए समझते हैं कि लोग ऐसा क्यों करते हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है।

आत्मरक्षा सिर्फ आपका अधिकार ही नहीं, बल्कि आपकी ज़िम्मेदारी भी है।

अर्जुन ने कहा कि अगर वह निहत्थे हों और पलटवार न करें, तो भी कौरवों के हाथों मारे जाने पर उन्हें खुशी होगी। यह सही नहीं है। याद रखें, जब कोई अधर्मी व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा हो, तो आत्मरक्षा के लिए कुछ भी न करना भी अधर्म है। इसलिए, आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि गलत काम करने वालों से अपना बचाव न करके आप महान बन रहे हैं। ऐसा करके, आप उन्हें और भी लोगों के साथ ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो धर्म तो बिलकुल नहीं है।

अहिंसा के नाम पर कायर बन जाना अधर्म है।

भारत में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने अहिंसा को एक ऐसा व्यव्हार बताया है जिसके अनुसार अगर कोई आप और आपके परिवार पर अत्याचार करे या जान से मारने की कोशिश करे और आप पर या आपकी औरतों पर बलात्कार करे, तो मजहबी या सामाजिक एकता बनाये रखने के लिए आप उनके खिलाफ कुछ न करें। यद्यपि उन नेताओं और उनके गुलामों ने इस रवैये को अहिंसा के तौर पर प्रचारित किया है, लेकिन यह अहिंसा नहीं है, असल में यह अपराधियों और अधर्मी लोगों को और ज़्यादा हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित करना है। अहिंसा का मतलब सिर्फ़ स्वयं हिंसा न करना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि अधर्मी लोग भी मासूमों के साथ हिंसा न करें। याद रखें, जो लोग मासूमों और आम लोगों के साथ हिंसा करने वाले और ऐसी हिंसा को बढ़ावा देने वाले हैं, उनके साथ हिंसा करना ही अहिंसा है।

श्लोक – 47
सञ्जय उवाच |
एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् |
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: ||

हिंदी अनुवाद:

संजय ने कहा,
ऐसा कहकर युद्धभूमि में शोकग्रस्त मन के साथ अर्जुन अपना तीर और धनुष छोड़कर रथ के पिछले भाग पर बैठ गया।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

संजय ने कुरुक्षेत्र की यह लाइव कहानी धृतराष्ट्र को सुनाते हुए आगे कहा कि ये सभी तर्क देने के बाद, दुखी अर्जुन ने तीर और धनुष रथ पर रख दिया और निराश मन से खुद भी रथ पर बैठ गए।

कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अर्जुन धनुष-बाण छोड़कर दुख में बैठे हैं, स्थिर कृष्ण शांति से खड़े हैं, और एक हथियारबंद कौरव योद्धा आगे बढ़ रहा है—यह अर्जुन विषाद योग में धर्म, अधर्म, अहिंसा और सही कर्तव्य के बीच संघर्ष का प्रतीक है।
AI-जनित युद्ध के मैदान में निराश अर्जुन और स्थिर कृष्ण का चित्रण

जब इंसान मोह में होता है, उसके साथ ऐसा ही होता है। वह धर्म विरुद्ध आचरण करने वाले लोगों से लड़ने से बचने के लिए ऐसे तर्क देता है, जो लगते तो सही हैं लेकिन पूरी तरह से धर्म के विरुद्ध होते हैं अर्थात पाप की ओर ले जाने वाले होते हैं।

खैर, आगे क्या होता है, यह अध्याय २ में बताया जाएगा क्योंकि अध्याय 1 “अर्जुन विषाद योग” यहीं खत्म होता है।

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