धर्म आवश्यक है लेकिन रिलिजन या मज़हब नहीं।

धर्म का अर्थ आधुनिक भारत में बहुत गलत समझा जाता है। इसे अक्सर रिलिजन या मज़हब समझा जाता है जो मनुष्य को कुछ परम्पराओं और नियमों में बांधते हैं। जबकि इसका असली अर्थ नियमों, रीति-रिवाजों और मान्यताओं से बिलकुल हटकर है। धर्म का अर्थ है ऐसे कर्म करना जो अधिकतर मासूम जीवों के लिए कल्याणकारी हों। और ये कर्म सिर्फ वर्तमान में जीवित प्राणियों के कल्याण के लिए नहीं बल्कि भविष्य में जन्म लेने वाले मासूम जीवों के लिए भी कल्याणकारी होने चाहिए। धर्म वास्तव में सत्य, न्याय, और सार्वभौमिक भलाई करने को कहते हैं।

धर्म, रिलिजन या मज़हब नहीं है

रिलिजन या मजहब अक्सर निर्धारित नियमों, विश्वासों या समुदाय-आधारित रीति-रिवाजों से जुड़ा होता है। दूसरी ओर, धर्म का बाबाओं या मौलवियों, पूजा स्थलों, या कट्टर प्रथाओं से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म कोई नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि एक जीवंत सिद्धांत है – जिसे बुद्दिमानी, सत्यनिष्ठता,और आत्मचिंतन के माध्यम से समझा जा सकता है।

धर्म, ईश्वर, और सार्वभौमिक सत्य एक ही सत्ता के तीन नाम हैं।

आमतौर पर ईश्वर को सिर्फ एक नाम या एक भौतिक रूप समझा या समझाया जाता है। लेकिन सच में ईश्वर केवल एक नाम या आकृति नहीं है – ईश्वर एक संस्था है जो केवल धर्म (निष्पक्ष लोक कल्याण) के साथ विद्यमान है। यदि कोई वस्तु या व्यक्ति, जिसके ईश्वर होने का दावा किया जाता है, कभी भी आपको धर्म (निष्पक्ष लोक कल्याण) के विरुद्ध कुछ करने के लिए कहता है, तो यह अपने आप में प्रमाण है कि वह ईश्वर नहीं है।

जहाँ धर्म (निष्पक्ष लोक कल्याण की भावना) नहीं है, वहाँ ईश्वर भी नहीं हो सकता।

कोई भी भौतिक नाम या रूप सच में ईश्वर है इसका प्रमाण सिर्फ उसके साथ जुड़ी हुई घटनाओ या क्रिया कलापों के विश्लेषण के द्वारा ही लगाया जा सकता है।

  • श्री कृष्ण भगवान हैं, लेकिन कृष्ण नाम वाला कोई भी व्यक्ति भगवान नहीं है। श्री कृष्ण के भगवान होने का प्रमाण भगवद्गीता में उनके द्वारा दिया गया धर्म का उपदेश है। और किसी भी उपदेश को धर्म का उपदेश नहीं मान लेना चाहिए, आत्मचिंतन करके निर्णय कीजिये की ये धर्म है या नहीं।  याद रखें, धर्म हमेशा तर्कसंगत होता हैं अतार्किक सिर्फ मज़हब या रिलिजन होता है।
  • श्री राम के भगवान होने का प्रमाण उनके मनुष्य रूप का धर्मसंगत आचरण और सभी प्राणियों के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण है, लेकिन राम नाम वाला कोई भी व्यक्ति भगवान नहीं हो सकता।
  • महादेव के ईश्वर होने का प्रमाण उनकी ध्यान में लीन रहने की प्रवृत्ति है, जो धर्म और ईश्वर को समझने का सर्वोत्तम तरीका है। लेकिन, महादेव या शिव नाम वाला कोई भी व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकता। क्योंकि ईश्वर सिर्फ एक नाम या मनुष्य शरीर नहीं बल्कि उस नाम या शरीर में स्थित चेतना का प्रवाह है।

तो मुद्दा यह है कि हमें ईश्वर या भगवान् के किसी भी नाम पर तब तक विश्वास नहीं करना चाहिए जब तक कि वह धार्मिकता (निष्पक्ष लोक कल्याण की भावना) से जुड़ा न हो, क्योंकि परमेश्वर केवल एक नाम नहीं है बल्कि सनातन धर्म का ही एक भौतिक स्वरुप है। इसलिए बिना धर्म धारण किया हुआ कोई भी भौतिक स्वरुप ईश्वर नहीं हो सकता।

इसी प्रकार, सार्वभौमिक सत्य – शाश्वत सिद्धांत – भी धर्म ही है।

फलस्वरूप, ईश्वर, धर्म और सत्य अलग-अलग नहीं हैं। वे एक ही परम तत्त्व की तीन अभिव्यक्तियाँ हैं।

जीवन में धर्म का पालन कैसे करें?

धर्म का पालन करना केवल उद्धरणों या नियमों का आँख मूँदकर पालन करना नहीं है। इसके बजाय, इसके लिए आंतरिक ईमानदारी, परिस्थिति के प्रति सजगता, और गहन बुद्दिमता की आवश्यकता होती है। धर्म का सही अर्थों में पालन करने के लिए:

  • आपको प्रत्येक स्थिति का निष्पक्षता से विश्लेषण करना चाहिए।
  • अपने अंतर्मन से ईमानदारी से बात करनी चाहिए, पक्षपातपूर्ण या अहंकारी रवैये के साथ नहीं।
  • आपको किसी भी व्यक्ति या परिणाम के प्रति स्वार्थ, व्यक्तिगत लाभ, भावनात्मक लगाव या पूर्वाग्रह नहीं रखना चाहिए।
  • भय, लोभ, रिश्तेदारों के प्रति वफ़ादारी, या लिखित शब्दों के प्रति अंध आज्ञाकारिता के दबाव में कार्य न करें।

याद रखें, जब आप शुद्ध इरादे, निष्पक्षता और निस्वार्थता के साथ निर्णय लेते हैं, तभी आप धर्म का पालन कर पाते हैं।

बुद्धिमत्ता नियम-पुस्तिका से बड़ी क्यों है?

कुछ मानव निर्मित नियमों को पत्थर की लकीर की तरह मानकर आप ये नहीं समझ सकते अलग अलग परिस्थितियों में क्या करना सही है। ये समझने के लिए आपको प्रासंगिक समझ और स्वयं से तर्क करने आवश्यकता होती है। जो एक परिस्थिति में सही हो, वह ज़रूरी नहीं कि दूसरी परिस्थिति में भी सही हो। लेकिन जब आप स्वयं से तर्क करके इस प्रकार कार्य करते हैं कि वह सभी जीवों (वर्तमान में उपस्थित और भविष्य में जन्म लेने वाले) के कल्याण के लिए हो, तब आप धर्म कर रहे होते हैं। 

तो, धर्म का पालन किसी नियम को अंधों की तरह मानकर नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे तर्क शक्ति के द्वारा पहचान कर निष्पादित किया जाता है। धर्म युक्त कर्म करने के लिए आपको, रूककर गहराई से सोचना होगा, निष्पक्ष होना होगा और फिर कार्य करना होगा। तभी आप धर्म का पालन कर पाएंगे। 

धर्म सत्य और दिव्यता का आधार है।

मज़हबों, उपनाम या कुल आधारित जातियों, भ्र्ष्ट हो चुकी राजनीति, और आस्थाओं के आधार पर विभाजित इस दुनिया में, हमें धर्म की ओर लौटना होगा अर्थात हमें लोक कल्याण के मार्ग पर लौटना होगा। धर्म कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो आपको भौतिक पहचान दे। यह वह समझदारी है जिसके अनुसार चलकरआप सुखपूर्वक जीते हैं और दूसरों (मनष्य और दुसरे प्राणी) को भी जीने देते हैं ।

यदि आपके कार्य, आपकी मान्यताएं, या वे नाम जिन्हें आप ईश्वर मानते हैं, धार्मिकता से जुड़े हुए नहीं हैं, तो वे सत्य से भी विच्छिन्न ही हैं। और जो सत्य नहीं उसका ईश्वर से कोई सरोकार नहीं।

आपको हमेशा धर्म को अपना दिशासूचक बनाना चाहिए, न कि रिलिजन, मजहब, कुल-आधारित जातियों, नियम-पुस्तिकाओं, या कट्टर परंपराओं को। ईमानदारी से सत्य की खोज करो, क्योंकि भगवान् सत्य से अलग नहीं रहते।

मेरे पास धर्म के बारे में बताने के लिए बहुत कुछ है और मैं उम्मीद करता हूँ कि नीचे सूचीबद्ध पृष्ठ आपके भीतर धर्म को उजागर करने में मदद करेंगे।

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