भगवत गीता का श्लोक 2.4 अर्जुन का वह अगला प्रश्न है, जो उन्होंने तब पूछा जब कृष्ण ने उनसे छोटी-मोटी भावनात्मक बाधाओं से ऊपर उठने को कहा। जब भगवान ने उनसे कहा कि मानवता के शत्रुओं से युद्ध करने से पीछे हटना कायरतापूर्ण, बदनामी कराने वाला, और धर्म की अवहेलना करना है, तो अर्जुन ने नैतिक मूल्यों का हवाला देना शुरू किया। हम उन मूल्यों का विश्लेषण करेंगे, और मनुष्य के कर्तव्य में बाधा डालने वाले और उसके कर्तव्य का पालन करने में सहायक नैतिक मूल्यों के बीच का अंतर पहचानना सीखेंगे। हम भगवान के सनातन सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, खुद को अर्जुन की जगह रखकर देखेंगे, ताकि अर्जुन की दुविधा और उसके सही समाधान को समझ सकें। भगवत गीता के दूसरे अध्याय के इस चौथे श्लोक की व्याख्या, अर्जुन की स्थिति की गहराई से पड़ताल करेगी, और हमें यह पहचानने में मदद करेगी कि जब हम ऐसी स्थितियों में फँस जाएँ, तो हमें क्या और क्यों करना चाहिए। आइए, इस संस्कृत गीता श्लोक के साथ शुरुआत करें।
अर्जुन उवाच |
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन |
इशुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ||
हिंदी अनुवाद:
अर्जुन ने कहा, हे मधुसूदन (कृष्ण)! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोणाचार्य पर बाणों से प्रहार कैसे सकता हूँ? हे अरिसूदन (शत्रुओं का नाश करने वाले – कृष्ण)! वे मेरे लिए पूजनीय हैं।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
इस श्लोक में, अर्जुन एक बार फिर अपने परिवार और रिश्तेदारों से युद्ध करने से बचने के लिए बहाने बनाने लगते हैं। अब, चूँकि, श्री कृष्ण उन्हें शारीरिक भावनाओं के प्रभाव में न आने के लिए पहले ही समझा चुके थे, इसलिए उन्होंने समाज द्वारा बनाए गए, कुछ नैतिक मूल्यों का हवाला देना शुरू किया। अब, उनके युद्ध से पीछे हटने के बहाने शारीरिक भावनाओं और मनुष्यों द्वारा निर्मित, असार्वभौमिक नैतिक मूल्यों का एक मिश्रण बन गए थे।
नैतिक मूल्य क्या हैं और वे क्यों महत्वपूर्ण है?
नैतिकता ऐसे नियम हैं जिन्हें समाज के प्रमुखों ने नासमझ लोगों में सही-गलत की समझ पैदा करने के लिए बनाया। ये नियम अक्सर बच्चों के लिए बनाए जाते थे, क्योंकि उनकी फ़ैसले लेने की क्षमता विकसित नहीं होती है बल्कि विकासशील होती है, और इसलिए उन्हें मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है। बाद में, जब ये बच्चे बड़े होने लगते थे, तो उन्हें उनके बुद्धिमान बड़े-बुज़ुर्गों के मार्गदर्शन में, जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में, अलग-अलग स्थितियों में, स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने दिया जाता था। इस तरह अभ्यास करते रहने से, उनमें फ़ैसले लेने की क्षमता विकसित होती थी, जिसे प्राचीन काल में ‘बुद्धिमत्ता’ कहा जाता था। जब वे अपने बुद्धिमान बड़े-बुज़ुर्गों की देखरेख में, नियमित रूप से, अपने फ़ैसले खुद लेने लगते थे, तो वे इतने समझदार हो जाते थे कि वे खुद ही तय कर सकें कि क्या सही है और क्या गलत। उसके बाद, उन्हें अपना जीवन जीने के लिए नैतिक मूल्यों और नियमों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, हालाँकि, उनके ज़्यादातर फ़ैसले नैतिक मूल्यों के अनुरूप ही होते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि नैतिक मूल्य बुद्धिमान लोगों ने ही तय किये होते थे, और ये बच्चे—जो बाद में बड़े हुए— वे भी बुद्धिमत्ता के आधार पर ही फ़ैसले लेते थे।
अगली पीढ़ी के बच्चों में भी, बुद्धिमत्ता जागृत करने के लिए, इसी प्रक्रिया का पालन किया जाता था, और यह सिलसिला चलता रहता था। इस तरह, प्राचीन काल में नैतिकता, बुद्धिमत्ता के विद्यालय में प्रारंभिक पाठ की तरह थी, लेकिन ये जीवन भर पालन करने वाले कोई कठोर नियम नहीं थी।
क्या नैतिक मूल्यों का हर हाल में पालन किया जाना चाहिए?
जैसा कि ऊपर बताया गया है, जिन छात्रों को शुरू में नैतिक मूल्य सिखाए जाते थे, वे छात्र, पत्थर की लकीर मानकर, हमेशा उनका पालन नहीं करते थे। इसके बजाय, वे सही और गलत के बीच फ़र्क करने के लिए, अपनी निश्चयात्मिक्ता बुध्दि का इस्तेमाल करते थे, क्योंकि नैतिक मूल्यों पर आधारित फ़ैसले, हर स्थिति में, एकदम सटीक नहीं हो सकते। क्यों? क्योंकि, आप (मनुष्य) ऐसा कोई नियम बना ही नहीं सकते जो सभी स्थितियों और परिस्थितियों में सटीक हो। नैतिक मूल्य सभी स्थितियों में सटीक तभी हो सकते हैं, जब आप एक ऐसी आदर्श दुनिया में रहते हों, जहाँ हर व्यक्ति पूर्णतया न्यायसंगत कर्म करता हो। चूँकि, अब हमारे आस-पास रहने वाले लोग पूरी तरह से दोषरहित नहीं होते हैं, इसलिए हम नियमों और मूल्यों का आँख मूँदकर पालन नहीं कर सकते, बल्कि हमें अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके यह तय करना होता है कि किस स्थिति में, क्या करना सही है। और अगर आप अपने फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में, नैतिक मूल्यों को शामिल करते ही हैं, तो आपको यह ज़रूर जाँच लेना चाहिए कि आपका अंतिम फ़ैसला धर्मसंगत भी सही हो।
नैतिकता और धर्म में क्या अंतर है?
- नैतिकता पहले से तय किये हुए सामाजिक नियम और मूल्य हैं, जबकि धर्म सार्वभौमिक मानवीय सिद्धांत हैं जो सभी जीवों के कल्याण को सुनिश्चित करते हैं।
- नैतिकता व्यक्तिपरक और वस्तुनिष्ठ होती है, जबकि धर्म अमूर्त सार्वभौमिक सिद्धांत होते हैं।
- नैतिकता किसी विशेष व्यक्ति या व्यक्तित्व, पद, वस्तु, कार्य आदि के लिए न्यायसंगत सोच से व्युत्पन्न होती है, जबकि धर्म सार्वभौमिक न्यायसंगतता के ईश्वर प्रदत्त सिद्धांत होते हैं।
- नैतिक मूल्यों को भावी पीढ़ियों के लिए पहले से ही परिभाषित किया जाता है, जबकि धर्म की पहचान निष्पक्ष और विवेकपूर्ण चिंतन के माध्यम से, हर पीढ़ी और मनुष्य को स्वयं ही करना होता है।
- नैतिकता हमें बताती है कि सामान्य रूप से क्या करना सही है, जबकि धर्म यह पुष्टि करता है कि विशिष्ट परिस्थिति में क्या करना सही है।
- नैतिकता बुद्धिमान लोगों द्वारा समाज को सही दिशा देने के लिए स्थापित की गयी मूल्य प्रणाली है, जबकि धर्म बुद्धिमान लोगों द्वारा पहचाने जाने वाले, मानवता को सही दिशा देने वाले ईश्वर द्वारा स्थापित, सार्वभैमिक सिद्धांत हैं।
- नैतिकता एक-तरफ़ा दृष्टिकोण का प्रतिपादन करती है, जबकि धर्म एक बहु-आयामी दृष्टिकोण द्वारा निर्धारित होता है।
- नैतिकता दृढ़ नियम होते हैं, जबकि धर्म स्थिति का मूल्याङ्कन करके, सभी के कल्याण को ध्यान में रखते हुए किये जाने वाले कार्य हैं।
- अलग-अलग लोगों और समुदायों के नैतिक मूल्य अलग अलग हो सकते हैं, जबकि धर्म हर समुदाय, विश्वास प्रणाली, मज़हब, आदि के भेदभाव से रहित, सबके लिए समान रहता है, चाहे लोग इसे स्वीकार करें या न करें।

नैतिकता और धर्म में अंतर – सामाजिक नियम बनाम ईश्वर के सार्वभौमिक सिद्धांतआइए, कुछ स्थितियों का विश्लेषण करें, जिनमें नैतिक मूल्यों का पालन, धर्म के पालन में बाधा बनता है।
अपने बड़ों का आदर और उनकी आज्ञा का पालन करना
अपने बड़ों का आदर करना और उनकी आज्ञा मानना एक नैतिक मूल्य है, लेकिन जब इसके कारण धर्म (मानवता) की हानि होने वाली हो, तो इस नैतिक शिक्षा को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए। आपको अपने बड़ों का सम्मान, उनकी पूजा, और उनकी आज्ञा का पालन तभी तक करना चाहिए, जब तक वे धर्म संगत (सृष्टि कल्याण के अनुरूप) आचरण कर रहे हों; लेकिन जब वे धर्म (वर्तमान और भविष्य के सभी मनुष्यों के कल्याण) के विरुद्ध आचरण कर रहे हों, तो ऐसा नहीं करना चाहिए।
धर्म हमें यह सिखाता है कि हमें न तो किसी महिला की गरिमा का हनन करना चाहिए और न ही ऐसे लोगों का समर्थन करना चाहिए जो ऐसा करने में लिप्त हों। धर्म (ईश्वर का सिद्धांत) यह कहता है कि हमें न तो किसी महिला का यौन शोषण या उत्पीड़न करना चाहिए और न ही उन लोगों का साथ देना चाहिए जो ऐसे कृत्यों में शामिल हों।
तो, अगर आपके बड़े-बुज़ुर्ग उन लोगों का साथ दे रहे हैं जो महिलाओं की गरिमा का हनन करते हैं, तो आपको उनका सम्मान करने के नैतिक मूल्य का पालन नहीं करना चाहिए। क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं, तो आप उस सोच को बढ़ावा देंगे, जिसके कारण, वर्तमान की और भविष्य में जन्म लेने वाली, लाखों-करोड़ों महिलाओं का यौन शोषण हो सकता है। इसलिए, ऐसी स्थितियों में, आपको बड़ों का सम्मान करने और उनकी आज्ञा मानने के नैतिक नियम को छोड़कर, धर्म (स्त्री के सम्मान की रक्षा) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
क्या हमें अपने बड़ों का आदर करना और उनकी आज्ञा मानना छोड़ देना चाहिए?
आपको बड़ों की आज्ञा मानने और उनका आदर करने जैसे मूल्यों का पालन करना सिर्फ़ इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए कि उनमें से कुछ लोग अधार्मिक (गलत आचरण वाले) थे। आपको उनकी सोच का गहराई से परीक्षण करना चाहिए—यदि वे धार्मिक (निष्पक्ष रूप से मानव जाति का कल्याण चाहने वाले) हैं, तो उनकी आज्ञा मानिए; और यदि वे अधार्मिक (बुराई के समर्थक) हैं, तो उनके विरुद्ध युद्ध छेड़ दीजिए। अर्थात, आपको बड़ों का आदर करने और उनकी आज्ञा मानने जैसे मूल्यों का आँख मूँदकर पालन करते रहने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि इस बात पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि क्या वे वास्तव में सही हैं।
याद रखें, यदि कोई नैतिक मूल्य अधर्म के लिए ढाल बन रहा है, तो वह नैतिक मूल्य नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्येक नैतिक मूल्य का उद्देश्य, धर्म (सभी निर्दोष जीवों के कल्याण की प्रवृत्ति) का पालन करना, उसकी रक्षा करना, और उसका प्रसार करना होता है। यदि कोई नैतिक मूल्य अधर्म (निर्दोष जीवों पर अत्याचार की प्रवृत्ति) और अधर्मियों (मासूमों का शोषण करने वाले) की रक्षा कर रहा है, तो वह नैतिक नहीं, बल्कि अनैतिक मूल्य है।
युद्ध में आम नागरिकों और बच्चों की हत्या अनैतिक है।
यह एक सर्वमान्य नैतिक मूल्य है कि किसी भी युद्ध में, आम नागरिकों और बच्चों पर हमला नहीं किया जाना चाहिए, और हमें इस नियम का पालन करना ही चाहिए। हालाँकि, जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए कि बच्चों के माता-पिता या अभिभावक ही आतंकवादी और बलात्कारी हों, और वे निर्दोष महिलाओं और बच्चों की आड़ लेकर छिपे हों, तो आपको इन निर्दोष बच्चों की सुरक्षा के लिए, युद्ध से पीछे हटने के विचार का त्याग करना पड़ सकता है; क्योंकि यदि किसी भी कारणवश, उन आतंकवादियों और बलात्कारियों को बख्श दिया गया, तो वे इन बच्चों और ऐसे ही कई अन्य निर्दोष लोगों का जीवन नरक बना देंगे।
नैतिकता सिखाती है कि युद्धग्रस्त देश के बच्चों को मृत्यु से बचाया जाना चाहिए, लेकिन धर्म (सृष्टि कल्याण की भावना) कहता है कि पूरी पृथ्वी के बच्चों को मज़हबी या किसी भी अन्य प्रकार के कट्टरपंथी शोषण से बचाया जाना चाहिए।
जब आप कट्टरवादी मज़हबी आतंकवादी देशों और समूहों से लड़ रहे होते हैं, तो आप उनसे नैतिक व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि उनके मज़हबी नियम कुछ इस प्रकार के होते हैं:
- वो कहते हैं कि जो औरतें अपना चेहरा और सिर खुला रखती हैं, वे पापी होती हैं; और इसलिए, वे ऐसी औरतों के साथ बलात्कार करते हैं और उन्हें मार डालते हैं। ये सब कुछ वे उस नैतिक मूल्य और ईश्वरीय सिद्धांत को ताक पर रखकर करते हैं, जिसके अनुसार एक नग्न महिला के साथ भी बलात्कार नहीं किया जाना चाहिए। असली भगवान के अनुसार, कोई नग्न या कम कपड़े पहनने वाली महिला मृत्यु-दंड या किसी और प्रकार के दंड की हकदार नहीं होती।
- वो कहते हैं कि अपनी कट्टरपंथी मज़हबी विचारधारा और मज़हबी पहचान पर आधारित समुदाय के विस्तार की प्रक्रिया में सब कुछ जायज़ है—जिसमें सामूहिक हत्याएँ (बच्चों सहित), बलात्कार, यातनाएँ, ब्रेन-वॉशिंग आदि सब कुछ शामिल हैं।
अब, चूँकि आप ऐसी कट्टरपंथी ताकतों से लड़ रहे हैं, इसलिए आप ऐसी कोई भी गलती नहीं कर सकते जिससे उन्हें जीवनदान मिल जाए; क्योंकि अगर उन्हें बख्श दिया गया, तो वे पूरी दुनिया में भारी तबाही मचायेंगे। आप सबसे अच्छा यही कर सकते हैं कि आतंकवादियों और कट्टरपंथियों से अपनी लड़ाई जारी रखें, और साथ ही कोशिश करें कि उन निर्दोष नागरिकों और बच्चों की जान का कम से कम नुकसान हो, जिन्हें ये लोग अपनी ढाल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।







Leave a comment