कहा जाता है कि इंसान धरती पर सबसे समर्थ और बुद्धिमान जीव हैं। लेकिन, वह अक्सर भावनाओं के नियंत्रण में आकर उन कर्मों से विमुख हो जाता हैं जिन्हे सबसे अच्छे से करने की क्षमता उसे ईश्वर ने दी है। वह मानसिक कमज़ोरी की वजह से ऐसा करता है, जो सत्य और आत्मतत्व के ज्ञान के आभाव और अनदेखी के कारण जन्म लेती है। यहाँ हमने भगवद गीता के अध्याय 2 के श्लोक 3 का विस्तृत वर्णन किया है जिससे इंसानों की इस कमी का हल बताया गया है। इस श्लोक में कृष्ण की आध्यात्मिक शिक्षाओं ने अर्जुन की भावनात्मक बंधनों से स्वयं को आज़ाद करने में मदद की, और ये शिक्षाएं हमें भी इन बंधनों की ग़ुलामी से आज़ाद होकर, अपनी क्षमता के अनुसार, बड़े से बड़ा सत्कर्म करने में मदद कर सकती हैं। यहाँ, भगवान ने इंसान के असली अस्तित्व और उसके परम सत्य के बारे में बताया है जिसे जानकर मनुष्य छोटी-मोटी भावनात्मक बाधाओं से स्वयं को आज़ाद कर सकता है। आइए, इस पर और ज़्यादा स्पष्टता पाने के लिए भगवद गीता श्लोक २.३ का भावार्थ और गहराई से समझते हैं।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||3||
हिंदी अनुवाद:
पार्थ (अर्जुन)! तुम अपने पुरुषत्व को मत खोओ, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है। हे शत्रुओं को जीतने वाले! इस क्षुद्र हृदय-दुर्बलता (भावनात्मक दुर्बलता) को छोड़कर [अपना धर्म करने के लिए] उठो।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि पुरुषत्व (धर्मयुक्त आचरण करने की प्रवृत्ति) को स्वयं में से ख़त्म न होने दो। आइए पुरुषत्व को समझते हैं:
ब्रह्मांड में हर चीज़ दो मुख्य घटकों से बनी है:
- पुरुष अर्थात जीवंतता।
- प्रकृति अर्थात दिखाई देने वाला रूप।

भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 3 पर आधारित इन्फोग्राफिक जिसमें पुरुष (आत्मा), प्रकृति (शरीर) और सच्चे पुरुषत्व का आध्यात्मिक अर्थ दर्शाया गया है।गीता के अनुसार सच्चा पुरुष और पुरुषत्व क्या है?
सामान्य बोलचाल में, आधुनिक भारतीय सोच में यह बात बैठा दी गई है कि पुरुष का मतलब आदमी होता है और इसी तरह पुरुषत्व का मतलब मर्दानगी होता है। यह समझ इंसानों के शरीर में भेद को परिभाषित करने के लिए ठीक हो सकती है, जहाँ एक नर को पुरुष और एक मादा को स्त्री कहा जाता है। लेकिन, जब आप आध्यात्मिकता में जाते हैं, तो पुरुष का तात्पर्य मानवजाति के एक लिंग से नहीं, बल्कि प्रत्येक जीवित प्राणी के शरीर की जीवंतता से होता है। यह पुरुष वह है जिसे आत्मा (सोल या स्पिरिट) भी कहा जाता है, और इसके दो हिस्से होते हैं:
- एक ऊर्जा जो शरीर के संचालन को सुनिश्चित करती है, जो पुरुष है।
- एक चेतना जो धर्म-संगत, न्यायसंगत आचरण सुनिश्चित करती है, जो पुरुषत्व है।
आत्मा का ऊर्जा घटक – पुरुष
आत्मा का यह घटक शरीर के मूल संचालन को सुनिश्चित करता है। इसे शारीरिक चेतना भी कहा जा सकता है। यह उन शारीरिक कार्यों का संपादन सुनिश्चित करता है जो किसी जीव के ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी हैं, जैसे सांस लेना, महसूस करना, खतरा महसूस होने पर तुरंत प्रतिक्रिया देना, शरीर की कोशिकाओं और ऊतकों का क्षय रोकना, आदि।
आत्मा का मानसिक चेतना घटक – पुरुषत्व
आत्मा का यह घटक सभी जीवों को धर्मयुक्त (सबके कल्याण के अनुरूप) फ़ैसले लेने में मार्गदर्शन करता है। हर बार जब आप कोई फ़ैसला लेते हैं, तो यह चेतना वाला हिस्सा आपको सही रास्ता बताता है, जबकि इंद्रियां और बाहरी विचारों का प्रभाव आपको गलत रास्ता चुनने के लिए उकसाते हैं। इसी स्थिति को अक्सर दुविधा कहा जाता है। इसी स्थिति में आपका विवेक काम आता है जिसकी मदद से आप यह पहचानते हैं कि आत्मा का मानसिक चेतना वाला घटक कौन सा रास्ता सुझा रहा है। इस सुझाव को पहचानने के लिए, आपको गहराई से सोचना होगा कि आपके मन में जिन दो रास्तों को लेकर दुविधा है, उनमें से प्रत्येक के दिमाग में आने का मुख्य कारण क्या है।
अधार्मिक मार्ग
आपका मन, मस्तिष्क, या दिल बाहरी लोगों, विचारों, वस्तुओं, परम्पराओं के प्रभाव में आकर या अपने व्यक्तिगत आनंद की इच्छा के प्रभाव में आकर जो रास्ता बता रहा है, वह अधार्मिक रास्ता है। यह रास्ता आपको सिर्फ़ नीचे दिए गए कारणों से सूझ रहा होता है।
- यह किसी ऐसी मानव निर्मित जाति (नाम, उपनाम, या पारिवारिक-पहचान) के पक्ष में होगा, जो आपकी भी पहचान है या जिसकी ओर आपका झुकाव है या जिसके पक्ष में बोलने से आपका फायदा है।
- यह उस रिलिजन या मजहब के पक्ष में होगा, जो आपकी भी पहचान है या जिसकी ओर आपका झुकाव है या जिसके पक्ष में बोलने से आपका फायदा है।
- यह उन व्यक्तित्वों, लोगों, या समुदायों के विचारों पर आधारित है जिनकी तरफ आपका झुकाव है या जिनसे आप किसी किसी भी प्रकार से जुड़े हुए हैं या जिसके पक्ष में बोलने से आपका फायदा है।
- इससे आपको व्यक्तिगत मजा मिलेगा।
- इससे आपका व्यक्तिगत और भौतिक फायदा होगा।
- यह कुछ ऐसा है जो सिर्फ़ कुछ जीवों की भलाई के लिए है, सभी जीवों (वर्तमान और भावी पीढ़ियों) के लिए नहीं।
धार्मिक मार्ग
आपका दिमाग, मन, या दिल, विवेक के आधार पर, अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर जो रास्ता बता रहा है, वही सही रास्ता है। लेकिन प्रश्न ये उठता है कि आप कैसे पहचानेंगे कि यह रास्ता आपकी अंतरात्मा या आपके विवेक के द्वारा सुझाया जा रहा है। इसकी सबसे सरल और सबसे बड़ी पहचान ये है कि यह रास्ता किसी भी प्रकार के भेदभाव पर आधारित नहीं होगा। आइए समझते हैं कि किसी भी निर्णय या रास्ते का भेदभाव रहित होने का क्या मतलब है।
- इसका मतलब है कि आप दैनिक जीवन में जो भी फ़ैसला लें, वो इसलिए न लें क्योंकि आप किसी मानव निर्मित जाति (उपनाम, समुदाय, या पारिवारिक पहचान) के ख़िलाफ़ हैं या उसकी तरफ़ आपका झुकाव है, बल्कि निर्णय इस आधार पर लें कि यह निर्णय सभी मासूम लोगों (आज की और आने वाली पीढ़ियों) की भलाई सुनिश्चित करेगा।
- इसका मतलब है कि आप जो भी फ़ैसला लें, वो इसलिए न लें क्योंकि आपका झुकाव किसी मज़हब या किसी खास मज़हबी पहचान वाले व्यक्ति की तरफ हैं या आप किसी रिलीजियस पहचान से नफ़रत करते हैं, बल्कि आपके निर्णय का आधार आज की पीढ़ी और आने वाली कई पीढ़ियों के सभी मासूम जीवों के साथ न्याय (धर्म) करना होना चाहिए।
- इसका मतलब है कि आपका कोई भी निर्णय किसी मशहूर हस्ती के उद्धरणों, किसी किताब के वाक्यों, या किसी समूह या समुदाय या मज़हब के विचार को न तो आँख बंद करके मानने पर आधारित होने चाहिए और न ही आँख बंद करके उनका विरोध करने पर आधारित होने चाहिए, बल्कि यह उन सभी की भलाई के लिए काम करने की इच्छा पर आधारित होने चाहिए, जो जानबूझकर किसी को नुकसान पहुँचाने की न ही कोशिश कर रहे हैं और न ही ऐसा करने की सोच रखते हैं।
- इसका मतलब है कि आप जो भी फ़ैसला लें, वह सिर्फ़ आपकी व्यक्तिगत खुशी, आपके समुदाय की ख़ुशी, आपके परिवार की खुशी और फ़ायदों पर केंद्रित नहीं होना चाहिए, बल्कि आपके निर्णय से ये भी सुनिश्चित होना चाहिए कि इससे किसी दूसरे जीव को कोई नुकसान नहीं होगा।
- इसका मतलब है कि आपका कोई भी फैसला किसी भी समुदाय के, लोगों के किसी समूह के, या दूसरे जीवों के प्रति किसी भी तरह के राग (मोह) या द्वेष (नफ़रत और जलन) पर आधारित नहीं होना चाहिए।
- इसका मतलब है कि आपके किसी भी कार्य या निर्णय का कारण आंतरिक या बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए बल्कि उनका कारण उन सभी के कल्याण की इच्छा होनी चाहिए, जो हैं और जो भविष्य में होंगे। आतंरिक दबाव के कुछ उदाहरण हैं अहंकार, गुस्सा, लगाव, जलन, आदि। बाहरी दबाव के उदाहरण समाज, सिस्टम, विचारधारा, संस्था, मज़हब, किसी तरह की पहचान आदि हो सकते हैं।
- इसका मतलब है कि आप जो कुछ भी करते हैं, वह सिर्फ़ कुछ जीवों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि सभी जीवों (आज की और आने वाली पीढ़ियों) की भलाई के लिए होना चाहिए।
तो, आध्यात्मिकता के हिसाब से, पुरुष कोई आदमी नहीं है, बल्कि वह ऊर्जा/चेतना/शक्ति है जो हमारे आस-पास दिखने वाले हर शरीर को चलायमान (जीवित) रखती है। यह वो चेतना या मार्गदर्शक भी है जो हमें, और सभी जीवों को, ज़िंदगी के हर मोड़ पर सही (धर्म-संगत) रास्ता सुझाती है। और इसलिए, श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वह अपने पुरुषत्व को न खोएं, अर्थात अपने धर्मयुक्त (सभी के कल्याण पर केंद्रित) फैसले लेने की क्षमता को, सिर्फ भावनात्मक दबाव की वजह से ख़त्म न होने दें। क्योंकि यह मोह और लगाव की भावनाएं ही उसे पुरुष (विवेक या अंतरात्मा या ब्रह्म) द्वारा सुझाये गए सही अर्थात वर्तमान और भावी पीढ़ी के कल्याण के रास्ते को छोड़ने के लिए मजबूर कर रही थीं। और अगर आप उस पुरुष के सुझाव नहीं मानते हैं, तो आप उसे गहरी नींद में जाने देते हैं जिसके बाद वह धीरे धीरे आपको सुझाव देना बंद कर देता है, और फिर, आपको माया या माया के गुलाम अपना गुलाम बना लेते हैं। भगवान का पुरुषत्व खोने से यही तात्पर्य है और इसलिए वह इसे न खोने का सुझाव देते हैं।
गीता में प्रकृति की व्याख्या
वैसे तो इस श्लोक में प्रकृति का ज़िक्र नहीं है, लेकिन क्योंकि हमने पुरुष के बारे में सीखा है, इसलिए हमें प्रकृति का अर्थ भी समझना चाहिए। प्रकृति वह सब कुछ है जो देखा जा सकता है, जो भैतिक है। प्रकृति, आत्मा (पुरुष) के कर्म करने का माध्यम है। इसका मतलब है कि आत्मा (पुरुष), शरीर (प्रकृति) का मालिक है और उसे शरीर का उपयोग स्वयं के सत्य रूप (आत्मा) को प्रतिबिंबित करने के लिए करना चाहिए। लेकिन, जब वह स्वयं को प्रतिबिंबित करने के लिए शरीर का इस्तेमाल नहीं करता (स्वयं को प्रतिबिंबित करने का मतलब है कि ईश्वर की तरह सर्वजन कल्याण के लिए कर्म करना) बल्कि स्वयं को शरीर समझने लगता है, तब वह अधर्म के रास्ते पर चलने लगता है। वह सभी पक्षपाती फैसले तभी लेता है जब वह खुद को शरीर समझने लगता है, यानी जब वह अपने वास्तविक स्वरुप (आत्मा) को भूल जाता है। इसी को कृष्ण ने तब “पुरुषत्व का खोना”कहा, जब अर्जुन खुद को सिर्फ एक शरीर समझने लगा और शारीरिक (प्रकृति-आधारित) भावनाओं के दबाव में आकर धर्म (न्याय) के लिए लड़ने से पीछे हटने की कोशिश करने लगा।
भगवद गीता अध्याय 2 के श्लोक 3 से मिलने वाली सीख
“प्रकृति-आधारित भावनाओं या कारणों से अपने पुरुषत्व को सोने मत दो, क्योंकि ये बाहरी नियम, परंपराएँ और शारीरिक भावनाएँ धर्म (सभी जीवों के कल्याण) के रास्ते में रुकावटें हैं, जबकि पुरुषत्व (अंतरात्मा की आवाज़), धर्म (सभी के लिए न्यायपूर्ण पथ) की दिशा बताने वाला मार्गदर्शक है।”




Leave a comment