श्लोक – 42
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ||
हिंदी अनुवाद:
संकरता (कर्त्तव्य से अनभिज्ञता और कर्त्तव्य की उपेक्षा) कुल के साथ विश्वासघात करने वाले (कुल को संकरता की स्थिति में लाने वाले) और पूरे कुल को ही नरक में ले जाता है। इससे पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण (मृत्यु के बाद सम्मान देने की रस्में) क्रियाएं भी ख़त्म होने लगती हैं और पूर्वज अपनी स्थिति से गिर जाते हैं अर्थात निम्न पदों को प्राप्प्त होते हैं।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
यहाँ अर्जुन ने बताया कि जब परिवार वर्ण-संकर (समाज और प्रकृति के प्रति अपने सही कर्तव्य की उपेक्षितता या अज्ञानता) की स्थिति में आ जाता है, तो यह परिवार के लिए नरक जैसी स्थिति बन जाती है। आइए समझते हैं कि अर्जुन ने किस बात पर ज़ोर दे रहे थे।
वर्ण-संकरता वंशजों का जीवन नरक बना देती है।
अर्जुन ने बताया कि वर्ण संकर कुल को नरक जैसी स्थिति में ले जाता है क्योंकि वे लोग, परिवार, समूह, समुदाय वगैरह, जो धर्म (हर मासूम जीव के लिए क्या सही है) को नहीं जानते, वे मानसिक गुलाम की ज़िंदगी जीते हैं। और गुलाम होना नरक में होने से कम नहीं होता।
वर्ण-संकर वंशजों के पूर्वज नरक में जाते हैं।
अर्जुन ने यह भी कहा कि परिवार के जो सदस्य वर्ण संकर का कारण बनते हैं, उन्हें कुल-घाती कहा जाता है और वे हमेशा नरक में दुख भोगते हैं। उन्होंने अपने लिए यह बात कही थी क्योंकि उन्हें लगा कि अगर वह कौरवों की तरफ से लड़ रहे अपने भाई-बंधुओं अदि को मार देंगे, तो वह कुरु वंश में वर्ण संकर का कारण बनेंगे।
कुरु वंश में वर्ण-संकरता के लिए कौन ज़िम्मेदार थे और क्यों?
असल में दुर्योधन, भीष्म और ऐसे ही दूसरे लोग कुल को धोखा देने वाले लोग थे जिन्होंने धर्म (न्यायसंगत कर्तव्य) का सही अर्थ नहीं समझा और अधर्म (अन्यायपूर्ण कर्म) करने में एक-दूसरे का साथ दिया।
वर्ण संकर का कारण भीष्म इसलिए थे क्योंकि उन्होंने एक क्षत्रिय के तौर पर अपने कर्तव्य को नहीं समझा। उन्हें लगा कि उनका कर्तव्य राजा और उसके परिवार की रक्षा करना है, लेकिन असल में एक क्षत्रिय का कर्तव्य राज्य और जनता की रक्षा करना होता है। राज्य और जनता की रक्षा करने के लिए यह सुनिश्चित करना होता है कि राजा और उसका परिवार जनता (वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों) की भलाई के लिए हर फैसला लें। क्षत्रिय को ये भी सुनिश्चित करना होता है कि राजा धर्म का पालन करे, और अगर वह ऐसा नहीं करता है, तो उसे ये सुनिश्चित करना चाहिए कि सत्ता एक असली क्षत्रिय को सौंप दी जाए। मैंने असली क्षत्रिय इसलिए कहा क्योंकि बहुत से लोग सोचते हैं कि क्षत्रिय वह होता है जो क्षत्रिय परिवार में पैदा होता है, लेकिन असल में क्षत्रिय वह व्यक्ति होता है जो जनता की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि राजपरिवार, राज्य के नागरिक, या कोई बहरी व्यक्ति जनता के साथ अधर्म (गलत काम) न करे।

सच्चे और फ़र्ज़ी देशभक्त का चित्रण— सच्चा देशभक्त देश का प्रतिनिधित्व करने वाले सिंहासन के सामने झुकता है, जबकि झूठा देशभक्त राजा और उसके परिवार के सामने झुकता है।दुर्योधन भी वर्ण संकर का एक सीधा कारण था क्योंकि वह स्वार्थी था, जबकि एक क्षत्रिय और ब्राह्मण को जन-कल्याण की प्रबल सोच रखनी चाहिए। दुर्योधन को लगता था कि राज्य उसका अधिकार है, लेकिन, वास्तव में, राज्य हमेशा एक क्षत्रिय की ज़िम्मेदारी होती है। एक सच्चा क्षत्रिय वह होता है जो लोगों के कल्याण के लिए पद संभालता है और उनके कल्याण के लिए अपना पद छोड़ने में भी हिचकिचाता नहीं है। एक क्षत्रिय का कर्तव्य (धर्म) स्त्री और उसके सम्मान की रक्षा करना होता है, लेकिन दुर्योधन उन लोगों को मारना चाहता था जिनकी महिलाओं के सम्मान के साथ दुर्योधन ने भरी सभा में खिलवाड़ किया था।
इस प्रकार दुर्योधन, अगर वह जीत जाता, तो कुरु वंश को वर्ण संकर की स्थिति में पहुंचा देता क्योंकि तब, उसके वंशज भी महिलाओं की गरिमा और सम्मान की रक्षा करने के बजाय उनके सम्मान के साथ खिलवाड़ करते।
किस स्थिति में अर्जुन वर्ण-संकरता के लिए जिम्मेदार होते?
अगर अर्जुन कौरवों से युद्ध नहीं करते, तो वर्ण संकर का कारण वही होते, क्योंकि तब आने वाली पीढ़ियों यह इतिहास पढ़ाया जाता कि जिस दुर्योधन ने महिलाओं का शोषण किया वह राजा बना। इससे कुरु वंश के वंशज महिलाओं के साथ दुर्योधन जैसा व्यवहार करने लगते, जो एक क्षत्रिय का धर्म नहीं है। और अगर आपको नहीं पता कि समाज के प्रति आपका धर्म क्या है, तो आप वर्ण संकर में हैं।
पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण पर वर्णसंकरता का प्रभाव
अर्जुन ने यह भी कहा कि वर्ण संकरता होने से वंशज अपने पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण जैसी क्रियाएं करना बंद कर देते हैं। इससे पूर्वज अपनी उच्च स्थिति से गिर जाते हैं और उनका सम्मान कम हो जाता है। असल में, वर्ण संकर के हर मामले में, वंशजों को परिवार की परंपराएँ सीखने का मौका नहीं मिलता, ठीक वैसे ही जैसे उन्हें धर्म (न्यायसंगतता और अपने कर्तव्य) सीखने का मौका नहीं मिलता। इसलिए, वो अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान ज्ञापित करने वाले श्राद्ध और तर्पण संस्कार करेंगे इसकी संभावना बहुत कम हो जाती है।
पूर्वजों के पतन से क्या तात्पर्य है?
पूर्वजों के पतन को मृत्यु के बाद की स्थिति के बजाय जीवित होने की स्थिति में ज्यादा अच्छे से समझा जा सकता है। यह एक ऐसे बिज़नेस की तरह है जो तब तक अच्छी तरह से बढ़ता है और बिज़नेस के संस्थापक का नाम समाज में बनाए रखता है जब तक संस्थापक के वंशज इसे अच्छी तरह से चलाते हैं और उन्हें (संस्थापक को) सम्मान के साथ याद करते रहते हैं।
इसके विपरीत, अगर वंशज बिज़नेस को ठीक से चलाने में निपुण नहीं हैं, तो वे इसे नई ऊंचाइयों पर नहीं ले जा पाएंगे। वे ब्रांड/बिज़नेस की स्थिति (पोजीशनिंग) को खराब भी कर सकते हैं। और, जैसे-जैसे बिज़नेस की पोजीशनिंग गिरती है, संस्थापक का सम्मान भी कम होने लगता है। इसी तरह, जब वंशज अपने पूर्वजों द्वारा निर्धारित समाज के प्रति उनके परिवार के पारम्परिक कर्तव्यों को ठीक से पूरा नहीं करते और समय-समय पर उन्हें याद नहीं करते, तो पूर्वजों का सम्मान भी कम हो जाता है। इस सम्मान की स्थिति से गिरने की अवस्था को ही पूर्वजों का पतन कहते हैं।
मृत्यु के बाद की स्थिति में, इसे समझना बहुत आसान है। हिंदू/भारतीय सभ्यता में यह पहले से ही माना जाता है कि जिन आत्माओं के वंशज अपने पूर्वजों के मृत्यु के बाद के संस्कार अच्छे से और नियमित रूप से करते हैं, वे शांति से रहती हैं। और जिन आत्माओं के वंशज अपने पूर्वजों के मृत्यु के बाद के संस्कार अच्छे से और नियमित रूप से नहीं करते, वे नरक में जाती हैं। मृत्यु के बाद की स्थिति में पूर्वजों के पतन का यही मतलब है
श्लोक – 43
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: |
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ||
हिंदी अनुवाद:
कुलघातियों के इस प्रकार के दोषपूर्ण कर्मों के कारण, जिससे वर्णसंकर (अपने कर्तव्य के प्रति उपेक्षितता या अनभिज्ञता) होता है, [कुल के वंशजों द्वारा] समाज के प्रति कुल के पारम्परिक कर्तव्य और मानव जाति के होने कारण उनके जो प्रकृति के प्रति कर्त्तव्य हैं उनका निर्वहन होना बंद हो जाता है।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
इस श्लोक में अर्जुन ने बताया कि परिवार को संकरता की स्थिति में ले जाना परिवार के साथ विश्वासघात करना है, क्योंकि इसके कारण परिवार के पारम्परिक जाति और कुल धर्मों (कर्तव्यों) को निभाने में रुकावट आती है।
जाति-धर्म का क्या मतलब है?
ज़्यादातर लोग जाति-धर्म को गलत समझते हैं। असल में, यहाँ जाति का मतलब आपके परिवार या उपनाम पर आधारित आपकी पहचान नहीं है। यहाँ जाति का मतलब जीव की नस्ल है, जिसके हिसाब से हम मनुष्य जाति से हैं और इसलिए यहाँ जाति-धर्म का तात्पर्य एक मनुष्य के तौर पर हमारे कर्तव्यों से है। तो, अर्जुन कह रहे हैं कि परिवार के बड़े-बुजुर्गों की मृत्यु होने से, धर्म (न्यायसंगतता – एक इंसान के तौर पर कर्तव्य) का ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुँचने में रुकावट आएगी, जिससे संकरता होगी, जिससे मनुष्य जाति की अगली पीढ़ियां मनुष्य धर्म (मानव के कर्त्तव्य) को न निभाकर किसी और (जैसे जानवर, राक्षस, अदि ) की प्रवृत्तियों का निर्वहन करने लगेंगी।
कुल-धर्म (कुल-आधारित कर्तव्यों) का क्या अर्थ है?
जाति धर्म के बाद अर्जुन की अगली चिंता यह थी कि इस युद्ध से कुलधर्म भी बाधित होंगे। उन्होंने ऐसा क्यों कहा? वास्तव में, प्राचीन समय में, भारतीय परिवार आम तौर पर अपनी विरासत अपने वंशजों को वैसे ही देते थे जैसे आज देते हैं। बस उनकी विरासत और आज की विरासत में इतना ही (ये जमीन आसमान का फर्क है) फर्क है कि वे अपने बच्चों को समाज, प्रकृति, और सृष्टि के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का ज्ञान और उस जिम्मेदारी को निभाने की समझ देते थे, जबकि आज के भारतीयों के पास अपने वंशजों के लिए विरासत के तौर पर या तो फालतू की पहचान (मजहबी पहचान, उपनाम आधारित पहचान, अदि) का घमंड होता है या सिर्फ़ भौतिक संपत्ति। तो, “कुल-धर्म बाधित होगा”, इसका मतलब है कि वंशज समाज की भलाई के लिए वे काम करना बंद कर देंगे जो उनके पूर्वज लंबे समय से करते आ रहे थे क्योंकि परिवार के सभी बड़ों की मृत्यु होने से वंशजों को यह समझ ट्रांसफर ही नहीं हो पायेगी कि उनके परिवार की समाज, प्रकृति, और सृष्टि के प्रति ज़िम्मेदारी क्या है।








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