कुल का पतन, वर्ण-संकर, और वर्ण व्यवस्था: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय -1, श्लोक – 39,40, और 41

श्लोक – 39
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् |
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||

हिंदी अनुवाद:

लेकिन यह जानने के बाद भी, हे जनार्दन (कृष्ण)! कि ये अपने वंश का नाश करने जैसे अपराध के रूप में दिखाई दे रहे हैं, हमें ऐसे पाप कर्मों से क्यों नहीं बचना चाहिए?

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

पिछले श्लोकों में, अर्जुन ने बताया कि वह क्यों लड़ना नहीं चाहते थे और कौरव क्यों लड़ रहे थे। उन्होंने कहा कि भले ही कौरवों को नहीं पता कि लालच गलत है, परिवार और दोस्तों के खिलाफ जाना गलत है, लेकिन वह (अर्जुन) तो जानते हैं कि ये गलत है और इसीलिए उन्हें ये युद्ध करना सही नहीं लग रहा।

हालांकि, अगर हम उनके तर्क पर थोड़ा चिंतन करें, तो ये समझ आता है कि धर्म के अनुसार वह गलत थे। असल में, अर्जुन या हममें से किसी को भी इस तरह के युद्ध इन दो कारणों से लड़ने चाहिए।

धर्म की रक्षा के लिए किसी को धोखा देना गलत है।

अगर धर्म (सृष्टि कल्याण की भावना) की स्थापना करने और अधर्म (व्यक्तिगत लाभ और दूसरों पर अत्याचार की भावना) को खत्म करने के लिए आपको अपने परिजनों और मित्रों को धोखा देना पड़े, तो आपको ऐसा करना अवश्य चाहिए क्योंकि मनुष्य होने के नाते यही आपका धर्म (कर्त्तव्य) है।

अधर्मी (अन्यायी) परिजन आपके अपने नहीं हैं।

जो लोग ऐसे काम (जैसे मासूम मनुष्यों और जीवों को हत्या, महिलाओं पर अत्याचार, आदि) कर रहे हैं, जो मनुष्य होने के नाते हमें नहीं करने चाहिए उनकी सहायता करने (उन्हें पैसे देने, खाना देने, दंड से बचाने, आदि) की आपकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। हाँ, आप उन्हें उस गलत कर्म करने से रोकने भर की उसकी सहायता कर सकते हैं, लेकिन जब तक वे उस गलत रास्ते पर हैं, तब तक आप उन्हें पैसे देकर या उन्हें दंड से बचाने की कोशिश करके उनका साथ नहीं दे सकते। और हाँ, जो लोग ऐसे लोगों को पैसे देकर या उसे दंड से बचाने की कोशिश करके उनकी मदद कर रहे हैं, उनके लिए भी आपका यही रवैया होना चाहिए।

श्लोक – 40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

हिंदी अनुवाद:

कुल [परिवार के रक्षकों और शिक्षकों] का नाश होने से कुल की धर्मरूप परम्पराओं का ह्रास होता है अर्थात उनका निर्वहन बंद हो जाता है, और सनातन कर्तव्य (धर्म) के नष्ट होने अर्थात सनातन कर्तव्यों का पालन न किये जाने से, कुल के [बचे हुए] वंशज अधर्म (पापपूर्ण कर्म) में पृवृत्त हो जाते हैं।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

अर्जुन ने आगे कहा कि जब महान कुलों का पतन होता है, तो उन कुलों के द्वारा समाज के लिए किये जाने धर्म (कर्तव्यों) का निर्वहन (पूरा करने की क्रिया) रुक जाता है, और जब परिवार के वंशज कुल के धर्मों (कर्तव्यों) का पालन नहीं करते हैं, तो उनमे प्रसन्नता का आभाव होने लगता है जिसके कारण अधर्म (गलत काम करने की प्रवृत्ति) उन पर और पूरे कुल पर हावी हो जाता है। इस श्लोक का असली भाव इस प्रकार है:

महान कुलों के पतन से धर्म का नाश कैसे होता है?

महान कुलों के पतन को यहाँ परिवार के मुखिया, बड़ों, और उन लोगों की मृत्यु कहा गया है, जो अपनी अगली पीढ़ी को धर्म (सही कर्तव्यों) का ज्ञान देते हैं। अर्जुन ने कहा कि इस पतन से “धर्म का नाश” होगा, जिसका मतलब है कि कुल के वंशज समाज के प्रति अपने धर्म (सृष्टि कल्याण के कर्तव्य) का पालन करना बंद कर देंगे। ऐसा क्यों होगा? क्योंकि उनके कुल के बड़े, जो अगली पीढ़ी के रक्षक और शिक्षक होते हैं, उन्हें यह सिखाने के लिए जीवित नहीं होंगे कि एक परिवार के तौर पर समाज के प्रति उनका कर्तव्य क्या है। और, जब कुल के वंशज समाज के प्रति अपना पारंपरिक धर्म (कुल के कर्तव्य) करना बंद कर देते हैं, तो वो पशुवत हो जाते हैं और सिर्फ भोग करने के लिए ही जीवित होते हैं और भोग की लालसा मनुष्य को लालची बनाती है और लालच देकर धूर्त लोग उनसे गलत कार्य करवाने लगते हैं और इस प्रकार ऐसे कुलों की अधर्म (पाप) के अंधेरे में जाने की संभावना बढ़ जाती है।

अधर्म के अंधकार में जाना क्या होता है ?

अधर्म के अंधकार में जाना कोई चमत्कार या काला जादू नहीं है, बल्कि कुल के वंशजों के अपने कुल धर्म (पारम्परिक जगत कल्याण के कर्तव्यों) से अनजान होने के कारण, उनमे भोग की प्रबल इच्छा और लोभ की प्रबल प्रवृत्ति का जन्म होने से, उनका बुरे लोगों और बुरे विचारों का गुलाम बनने की घटना है। ऐसा होने पर वे खुद को और अपनी आने वाली पीढ़ियों को पाप कर्मों में लिप्त कर देते हैं और इस प्रकार वे अगली सभी पीढ़ियों को अधर्म के गहरे अंधकार में धकेल देते हैं।

कर्ण इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है, जो कुंती का बेटा था, लेकिन उसे अपने वंश के बारे में पता न होने के कारण कुल-आधारित कर्तव्यों का भी सही ज्ञान नहीं था। इसलिए, उसमे अहंकार और क्रोध की प्रवृत्तियों ने जन्म लिया और वह बुरे विचारों का गुलाम हो गया। वह लगातार यही सोचता रहा कि उसका अधिकार क्या है, बजाय इसके कि समाज के प्रति उसके कर्त्तव्य क्या हैं। इस सोच ने उसे राज्य, पैसा, सम्मान, आदि के बदले में और अपने गुस्से और अहंकार को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ, चाहे वह सही हो या गलत हो, करने पर मजबूर कर दिया। इस प्रकार कुल धर्म का ज्ञान न होने से अंततः वह अधर्म (पाप) के गहरे और अंधेरे गर्त में गिर गया।

श्लोक – 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: |
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: ||

हिंदी अनुवाद:

हे कृष्ण! अधर्म के हावी होने पर, कुल की स्त्रियां [मानसिक, शारीरिक, पारम्परिक, आदि प्रकारों से] अपवित्र हो जाती हैं। जब वे अपवित्र हो जाती हैं, तो, हे वार्ष्णेय (कृष्ण)! इससे वर्णसंकर (अपने कर्तव्य के प्रति अज्ञानता या अनभिज्ञता) उत्पन्न होता है।

व्याख्या और वास्तविक मर्म:

अर्जुन आगे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जब कुल या परिवार अधर्म के कब्ज़े में आ जाता है, तो महिलाओं का क्या होता है। वह बताते हैं कि परिवार पर अधर्म की मज़बूत पकड़ परिवार की स्त्रियों को दूषित कर देती है। वह आगे कहते हैं कि वे दुष्ट, मनमौजी, या प्रताड़ना की शिकार हो जाती हैं जिससे वर्णसंकर होता है। आज बहुत से लोग इस तरह सोचते हैं कि वर्णसंकर सिर्फ़ इसलिए होता है क्योंकि एक महिला ऐसे आदमी से शादी करती है या संबंध बनाती है जो ऐसे परिवार का है जिसका वर्णाश्रम महिला के पैतृक परिवार के वर्णाश्रम से अलग है। यह सही नहीं है। ये एक कारण हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। आइए इसे ठीक से समझने के लिए श्लोक ४१ के सभी बिंदुओं को एक-एक करके समझते हैं।

स्त्रियों या महिलाओं के दूषित होने का अर्थ

इस श्लोक में पहली बात यह थी कि अधर्म के कारण परिवार की औरतें अपवित्र हो जाती हैं। इसका मतलब है कि जब परिवार के पुरुष, जो प्रायः परिवार के रक्षक होते हैं/थे, मर जाते हैं, तो विरोधी पक्ष के अधर्मी आदमियों द्वारा इन मृत पुरुषों के स्त्रियों को गुलाम बनाने की संभावना प्रबल हो जाती है। और उसके बाद उन अधर्मियों के द्वारा उन स्त्रियों के मानसिक, शारीरिक और यौन रूप से प्रताड़ित होने की संभावना बन जाती हैं। इस तरह, औरतें मानसिक और शारीरिक रूप से अशुद्ध (अपवित्र) हो जाती हैं, जिसका मतलब है कि या तो वे सदमे के कारण सही फैसले लेने और सही काम करने की क्षमता खो देती हैं, या वे स्वतंत्र न होने के कारण सही फैसला लेने और सही काम करने का अधिकार खो देती हैं।

कोई भी युद्ध हारने से वर्ण-संकर कैसे हो सकता है ?

अगर किसी महिला के पहले से बच्चे हैं, लेकिन वह अधर्मियों की गुलाम है, तो इस बात की बहुत कम संभावना है कि वह अपने बच्चों को धर्म (समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य) सिखा पाएगी क्योंकि अधर्मी कभी भी उसे यह करने नहीं देंगे। और जब किसी पीढ़ी को समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं होता, तब उसे वर्णसंकर कहा जाता है।

यह AI-जनरेटेड इमेज दिखाती है कि परिवार का आदमी परिवार की रक्षा करता है और परिवार के बड़े लोग अगली पीढ़ी को ज्ञान देते हैं। लेकिन, जब परिवार के ये आदमी मर जाते हैं, तो सुरक्षा न मिलने से महिलाएं अधर्मियों की गुलाम हो जाती हैं और ज्ञान न मिलने से बच्चे अधर्मी अर्थात वर्णसंकर के शिकार बन जाते हैं।
परिवार के पुरुषों और बड़ों की मौत के बाद वर्णसंकर के उदाहरण का AI-जनरेटेड चित्रण

एक और मामला यह हो सकता है कि महिलाओं के पहले से बच्चे हों, लेकिन उन्हें (महिलाओं को) अधर्मी प्रताड़ित करें और गुलाम बना लें, तो हो सकता है कि वे महिलाएं अपनी मानसिक स्थिरता खो दें, जिसके परिणामस्वरूप अपने बच्चों को धर्म (समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य) न सिखा सकें। इससे बच्चों की वह विचार और प्रवृत्त्ति सीखने की संभावना बढ़ जाती है जो उन अधर्मियों में हैं जिन्होंने उनकी माँ को गुलाम बनाया हुआ है। इस तरह, भविष्य में उन बच्चों के अधर्म करने, अधर्म के विस्तार के बारे में सोचने और अगली पीढ़ियों को अधर्म ही सिखाने की संभावना का विस्तार होता है, जिससे वे सभी पीढ़ियां वर्ण संकर बन जाती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में बाबर और औरंगज़ेब के कई अनुयायी या प्रेमी इस तरह की वर्ण संकरता के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

वर्ण संकर का एक और मामला तब होता है जब अधर्मी लोग युद्ध में मारे गए लोगों की महिलाओं का यौन उत्पीड़न करते हैं, बलात्कार करते हैं, या उन्हें अपना गुलाम बना लेते हैं। उसके बाद, ज़ाहिर है, वे यह भी पक्का करते हैं कि ऐसे संबंधों से पैदा हुए बच्चों को भी अपना गुलाम बनाया जाए। उन्हें गुलाम बनाने के लिए, वे यह पक्का करते हैं कि बच्चे कुछ भी ऐसा न सीखें जो उनकी (अधर्मियों की) अपनी अधार्मिक सोच से अलग हो। अब, अगर बच्चे अधर्म के अलावा कुछ और नहीं सीखेंगे, तो ज़ाहिर है, वे अधर्मी बन जाएंगे। भारतीय उपमहाद्वीप में बाबर और औरंगज़ेब के ज़्यादातर प्रेमी इस तरह के वर्ण संकर के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

तो, ऊपर बताए गए और ऐसे ही कई दूसरे मामलों में, उन बच्चों के, जो अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने वाले हैं, मूर्खों और अत्याचारियों के अधार्मिक (गलत) विचारों, तरीकों, और प्रवृत्तियों को सीखने की प्रबल संभावना होती है। और अगर वे ये सीखते हैं तो वे खुद अधार्मिक जीवन जीते हैं, फलस्वरूप, वे अपने बच्चों को भी यही सिखाते हैं। इस तरह, कुल की आने वाली सभी पीढ़ियां अधर्म को मानने वाली बन जाएगी। और जब वे पीढ़ियां अधार्मिक हो जाएँगी, तो वे इंसानियत, प्रकृति और दूसरे जीवित प्राणियों का शोषण करेंगी, और इसी को वर्णसंकरता कहते हैं।

वर्ण संकर क्या है?

ऊपर बताए गए वर्णन के बाद, एक नया सवाल उठता है कि अर्जुन ने जिस वर्णसंकर का ज़िक्र किया है, वह क्या है। असल में, वर्णसंकर का मतलब है समाज और दुनिया के प्रति अपने धर्म (कर्तव्य) के बारे में अनजान होना। और जब किसी कुल की आने वाली पीढ़ियाँ अधर्म के रास्ते पर चली जाती हैं, तो वे किसी भी वर्णाश्रम का हिस्सा नहीं रहतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्णाश्रम धर्म पर आधारित है, अधर्म पर नहीं।

कौन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं हो सकता?

यह वर्ण-व्यवस्था इंसानों के बीच धर्म (सृष्टि कल्याण की भावना) का प्रचार प्रसार करने और उसका पालन करने के लिए है। धर्म के बिना, आप किसी भी वर्ण का हिस्सा नहीं बन सकते। एक शिक्षक तब तक ब्राह्मण नहीं हो सकता जब तक वह दूसरों को धर्म (सृष्टि कल्याण की भावना) नहीं सिखा सकता और उन्हें भगवान से नहीं जोड़ सकता। एक नेता या योद्धा या सैनिक क्षत्रिय तब तक नहीं हो सकता जब तक वह सभी मासूम जीवों की सुरक्षा और विकास के लिए काम नहीं करता है। (याद रखें, जो लोग खुद को मासूम बताते हैं लेकिन महिलाओं और दूसरे जीवों का शोषण करते हैं, वे मासूम इंसान नहीं हैं।) एक बिजनेसमैन जो दूसरे इंसानों और जीवों का शोषण करके पैसा कमाता है और फिर उन्हें शोषण करने के लिए पैसा खर्च करता है, वह वैश्य नहीं हो सकता। एक कर्मचारी या मुलाजिम जो उस संस्था के धर्मसंगत लक्ष्य की प्राप्ति को ध्यान में रखकर काम नहीं करता जहाँ वह काम करता है, वह शूद्र नहीं हो सकता। कुल मिलाकर, आप वर्णाश्रम का हिस्सा तभी बन सकते हैं जब आप सभी जीवों (वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों) के लिए धर्म (कल्याणकारी कर्म) करने की सोच के साथ काम करें।

किसी भी वर्ण का हिस्सा बनने के लिए बुनियादी जरूरतें

किसी भी वर्ण का व्यक्ति किसी भी शारीरिक, religios/मज़हबी, सरनेम-आधारित, भाषा-आधारित, क्षेत्र-आधारित, और किसी भी दूसरी पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। उसे बस हर चीज़ और हर किसी को धर्म और अधर्म के आधार पर जज करना होता है। धर्म (नेकी) वह है जिसका आपको साथ देना है, अधर्म (बुराई) वह है आपको जिसको खिलाफ खड़े होना है। बस जीवन जीना बहुत आसान है।

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