श्लोक – 21
अर्जुन उवाच
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय ||
हिंदी अनुवाद:
[संजय ने आगे कहा],
हे राजन! तब [अर्जुन] ने ये बातें इंद्रियों के नियंता [या भगवान] (श्री कृष्ण) से कहीं। अर्जुन ने कहा, हे अच्युत (कृष्ण)! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करो।
श्लोक – 22
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे।।
हिंदी अनुवाद:
जब तक मैं इन युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुओं का ठीक से निरीक्षण न कर लूँ और यह न समझ लूँ कि इस युद्ध में मुझे किन से लड़ना है।
श्लोक – 23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।
हिंदी अनुवाद:
मैं युद्ध करने के लिए आए, यहाँ एकत्रित, उन योद्धाओं को देखना चाहता हूँ जो यहाँ धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्रों का प्रिय चाहने वाले हैं।
श्लोक – 24
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।
हिंदी अनुवाद:
संजय ने कहा,
हे भारतवंशी! निद्रा के नियंत्रक [अर्जुन] के ऐसा कहने पर इंद्रियों के नियंत्रक [कृष्ण] ने [अर्जुन का] वह महान रथ दोनों सेनाओं के बीच [श्री कृष्ण द्वारा] खड़ा कर दिया |
श्लोक – 25
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।।
हिंदी अनुवाद:
भीष्म, द्रोण और दूसरे मुख्य राजाओं के सामने तब [श्री कृष्ण] ने कहा, हे पार्थ (अर्जुन)! इन सभी कुरुवंशियों को देखो जो यहाँ पर इस प्रकार एकत्रित हुए हैं।
श्लोक – 26
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।
हिंदी अनुवाद:
पार्थ (अर्जुन) ने तब वहाँ खड़े अपने पिता तुल्यों, दादाओं, शिक्षकों, मामाओं, भाइयों, बेटों (भाइयों के), पौत्रों (भाइयों के बच्चों), तथा मित्रों की ओर देखा।
श्लोक – 27
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।।
हिंदी अनुवाद:
उसने दोनों सेनाओं में भाग लेने वाले अपने ससुरों और शुभचिंतकों को भी देखा। अपने रिश्तेदारों को इस तरह युद्ध के लिए तैयार देखकर, वह, कुंती (अर्जुन) का पुत्र –
श्लोक – 28
कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।।
हिंदी अनुवाद:
अत्यधिक करुणा से भर कर, शोक प्रकट करते हुए ऐसे वचन बोला। अर्जुन ने कहा, हे कृष्ण! इन सगे-संबंधियों को अपने शत्रु योद्धाओं के रूप में देखकर –
श्लोक – 29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।
हिंदी अनुवाद:
मेरे अंग कांप रहे हैं, और मेरा मुंह सूख रहा है, और मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है, और पूरे शरीर में रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
व्याख्या और वास्तविक मर्म:
इन श्लोकों में, अर्जुन ने श्री कृष्ण से, जो उनके सारथी बने थे, कहा कि वे उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करें। उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि जब तक वे कौरवों के योद्धाओं का ठीक से निरीक्षण नहीं कर लेते, तब तक रथ को वहीँ बीच में खड़ा रखें। उन्होंने कहा कि वे उन योद्धाओं को देखना चाहते हैं जो मूर्ख दुर्योधन का साथ देना चाहते हैं। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि:
- शायद वह इस बात से हैरान थे कि इतने ताकतवर और समझदार कहे जाने वाले लोग अधर्म करने वालों का साथ दे रहे थे।
- शायद, वह समझना चाहते थे कि दूसरी तरफ किस तरह के योद्धा हैं क्योंकि हर किसी के लिए युद्ध शुरू करने से पहले अपने दुश्मनों की ताकत और कमजोरियों को जानना ज़रूरी होता है।
संजय आगे धृतराष्ट्र को अर्जुन की उस समय की स्थिति के बारे में बताते हैं जब उन्होंने श्री कृष्ण से दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा करने के लिए कहा था। संजय कहते हैं कि श्री कृष्ण, जिन्हें उन्होंने हृषकेश कहा, अर्जुन का रथ, जिन्हें उन्होंने गुडाकेश कहा, दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करते देते हैं।

AI द्वारा बनाई गई कृष्ण और अर्जुन की तस्वीर जिसमे वे दोनों सेनाओं के बीच खड़े हैंउन्होंने बताया कि श्री कृष्ण ने रथ को ऐसी जगह पर खड़ा किया, जहाँ से कौरवों की सेना के मुख्य योद्धा, जैसे भीष्म, द्रोण, आदि को साफ़ देखा जा सकता है। वहाँ रथ स्थापित करने के बाद, श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा,
“कुरु वंश के इन योद्धाओं को देखो, जो तुमसे युद्ध करने के लिए यहां एकत्र हुए हैं।”
कृष्ण ने यह बात अर्जुन में युद्ध के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए कही थी। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा ताकि अर्जुन को एहसास हो कि युद्ध इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि वह युद्ध चाहता था, बल्कि इसलिए हो रहा था क्योंकि कौरव भी यही चाहते थे। उसके बाद, अर्जुन अपने सभी रिश्तेदारों, जैसे पिता, दादा, गुरु, मामा, भाई, भतीजे, भतीजों के बच्चे, दोस्त वगैरह को देखता है और दया और दुख से भर जाता है। और फिर, वह अपने उस दुःख के बारे में बताना शुरू करता है। वह आगे भगवान कृष्ण को बताता है कि उसे बेचैनी, उलझन, और भी बहुत कुछ महसूस हो रहा था जो उसे युद्ध से पीछे हटने पर विवश कर रहा था। इसके आगे क्या हुआ और क्यों हुआ, यह समझने से पहले, आइए समझते हैं कि अर्जुन को गुडाकेश और श्री कृष्ण को ऋषिकेश क्यों कहा गया।
गुडाकेश का अर्थ
अर्जुन को गुडाकेश कहा गया है, जो दो शब्दों से मिलकर बना है – गुडक और ईश, जिसका मतलब है नींद का नियंत्रक। यहाँ नींद का इस्तेमाल अज्ञान के सन्दर्भ में किया गया है, जिसका मतलब है धर्म (जगत कल्याण के लिए किये जाने वाले कार्यों) की समझ की कमी। यह नाम अर्जुन को यूँ ही नहीं दिया गया था, बल्कि अर्जुन ने सिद्ध किया था कि उनमें अज्ञान (धर्म की समझ की कमी) पर जीत हासिल करने की मज़बूत इच्छाशक्ति थी। इसीलिए तो अर्जुन ने खुद को श्री कृष्ण के हवाले कर दिया और भगवान के उस मनुष्य रूप से, ‘धर्म क्या है’, इस बारे में सवाल पूछे।
ऋषिकेश का अर्थ
यहाँ, श्री कृष्ण को हृषिकेश कहा गया है, जो दो शब्दों – हृषिक और ईश से मिलकर बना है, जिसका मतलब है इंद्रियों का नियामक या भगवान। श्री कृष्ण को इंद्रियों का नियामक इसलिए कहा गया है क्योंकि कोई भी इंद्रिय उन्हें अधर्म (गलत काम, गलत फैसले और गलत सोच) करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इसका अर्थ है कि वह खुद इन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं न कि इन्द्रियां उन्हें। अब क्योंकि उन्हें किसी भी शारीरिक इंद्रिय या बाहरी असर से अधर्म करने या उसका साथ देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, इसलिए वे पक्का धर्म (संपूर्ण सृष्टि के लिए किये जाने वाले कार्य) ही करेंगे और सबको वही करना सिखाएंगे भी। कृष्ण में धर्म की यही अथाह समझ उनको भगवान सिद्ध करती है, न कि सिर्फ़ उत्तरा और अभिमन्यु के बेटे परीक्षित को ज़िंदा करने की उनकी क्षमता।
हम इस आर्टिकल को यहीं समाप्त करेंगे और अगले श्लोकों में बात करेंगे कि दोनों सेनाओं को देखने के बाद अर्जुन कृष्ण से और क्या कहते हैं।







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