कई लोग भगवद् गीता को एक साम्प्रदायिक (मजहबी/religious) नियम पुस्तक मानते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह एक ऐसा ग्रंथ है जो मनुष्यों को धर्म (सत्कर्म, सद्विचार, और सद्वाणी) का स्पष्ट ज्ञान प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि भगवद् गीता वह ज्ञान है जो हमें जीवन जीने का तरीका सिखाता है।

एक युवक जो भगवद् गीता पढ़ रहा है, जिससे उसकी बुद्धि प्रकाशित हो रही है।अब बहुत से लोगों को लग सकता है कि जीवन जीने के तरीके का अर्थ किसी समूह द्वारा समय के साथ अपनाए गए कुछ रीति-रिवाज या नियम या जीवनशैली है। जबकि ऐसा नहीं है, बल्कि जीवन जीने के तरीके का वास्तविक अर्थ वह सार्वभौमिक कर्तव्य हैं जिनका पालन सभी मनुष्यों को करना चाहिए। ये कर्त्तव्य ही धर्म भी कहे गए हैं और इनके पालन से सभी जीवों का कल्याण होता है। और अगर आपके किसी भी कार्य से किसी भी मासूम/निरपराध जीव को कष्ट होता है तो समझ लेना कि वह अधर्म है। वह जीवन जीने का सही तरीका नहीं है, फिर चाहे वैसे ही कार्य आपके पूर्वजों ने शताब्दियों तक ही क्यों न किये हों।
भगवद् गीता पढ़ते समय हमें कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। इनमे सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें इसे केवल पढ़ना ही नहीं चाहिए, बल्कि इसका गहन अध्ययन करना चाहिए।
भगवद्गीता का पूर्ण और गहन अध्ययन क्यों आवश्यक है?
जब हम गीताजी को केवल अपने जीवन की किसी एक समस्या का समाधान खोजने के लिए पढ़ते हैं, तो हम उसमे समाधान नहीं ढूंढ पाते हैं । ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवद्गीता किसी religious/मज़हबी किताब की तरह कोई नियम पुस्तिका नहीं है जहाँ कुछ स्थितियों का और उनमे क्या करना है ये लिखा है। यह वास्तव में एक दिव्य ग्रंथ है जो मानव शरीर के लिए सार्वभौमिक सिद्धांतों/कर्तव्यों की जानकारी प्रदान करता है। इन सिद्धांतों को इस प्रकार समझाया गया है कि इन्हे अलग अलग प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति वाले लोग आसानी से समझ सकें। इसमें बताया गया प्रत्येक सिद्धांत उन लोगों के लिए भी है जो मानते हैं कि परलोक या मृत्यु के बाद कर्मफल जैसी कोई चीज़ है और उन लोगों के लिए भी जो इस तथ्य पर विश्वास नहीं करते। इस धर्म ग्रन्थ की सबसे अच्छी बात यह है कि आप चाहे लोक परलोक को मानने वाले हों या न हों, ये आपको धर्म के मार्ग पर अवश्य ले जाएगी और धर्म का मार्ग सभी जीवित प्राणियों के कल्याण करने वाला होता है।
भगवद्गीता का स्वाध्याय करना क्यों आवश्यक है?
यदि हम भगवद्गीता का अध्ययन अपने आप नहीं करते हैं, तो श्रीकृष्ण (ईश्वर) की शिक्षाओं के वास्तविक सार को समझने की हमारी सम्भावना कम हो जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर हम स्वयं अध्ययन नहीं करेंगे, तो या तो हम इसे नहीं सीख पाएंगे या तो किसी और से सीखेंगे। अब अगर कोई ऐसा सिखाने वाला मिल गया जो खुद ही श्री कृष्ण की वाणी का सही अर्थ नहीं समझ सका तो वो आपको भी गलत मतलब ही सिखा देगा।

भगवद् गीता पढ़कर उस पर गहन चिंतन करता हुआ एक व्यक्ति।दूसरी ओर, यदि आप दूसरों से सीखने के साथ-साथ स्वयं अध्ययन और आत्म-चिंतन भी करते हैं, तो आपके द्वारा इसका वास्तविक अर्थ समझने की संभावना बढ़ जाती है, फिर भले ही आपको सिखाने वाले ने आपको गलत व्याख्या दी हो। इसलिए, सभी को मेरी सलाह है कि आप स्वयं भी भगवद्गीता का अध्ययन करें और इंटरनेट, AI, विभिन्न धर्मग्रंथों, और ज्ञानी मनुष्यों से प्रश्न पूछकर भी गीता का वास्तविक सार जानने की कोशिश करें।
भगवद्गीता का अध्ययन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
भगवद्गीता का अध्ययन करते समय प्रत्येक विद्यार्थी को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। वे ये हैं:
- भगवद्गीता को इस विश्वास के साथ पढ़ें कि श्री कृष्ण ईश्वर हैं और ईश्वर गलत बातें नहीं कहते। ईश्वर में विश्वास रखने का अर्थ है कि उन्होंने जो कुछ भी कहा है वह गलत नहीं हो सकता और यदि आपकी अंतरात्मा को भगवद्गीता में लिखी कोई बात गलत लगे, तो उसका सही अर्थ जानने के लिए उसे बार-बार पढ़ें।
- भगवद्गीता भगवान कृष्ण द्वारा कही गई है, लेकिन इसे मनुष्यों द्वारा एक पुस्तक के रूप में छापा और प्रकाशित किया गया है। इसलिए, यदि आपको गीता जी में कुछ भी गलत लिखा हुआ लगता है, तो इसका अर्थ है कि उसमें छेड़छाड़ की गई है। यदि आपके हाथ गीता का ऐसा कोई छेड़छाड़ किया गया संस्करण लगता है, तो आपको भगवद्गीता के पुराने, मूल और बिना छेड़छाड़ किए गए संस्करण को खोजकर पढ़ना चाहिए, न कि गलत बातों को सत्य मान लेना चाहिए।
- एक बात याद रखिये कि भगवद्गीता के असली बिना छेड़छाड़ वाले संस्करण को दुनिया भर से नष्ट नहीं किया जा सकता, यह किसी न किसी स्थान पर अवश्य मौजूद होगा। आपको बस थोड़ा अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता है।
- आज, सितंबर 2025 में, मुझे गीता प्रेस संस्करण सबसे सही लगता है और मेरी व्याख्या उसी पर आधारित है।

भगवद् गीता पुस्तक का एक चित्र। इसी पुस्तक से लेखक अध्ययन करता है।- गीता का कोई भी संस्करण असली है या नहीं इसको पहचानने का तरीका बहुत आसान है। अगर आप असली भगवद्गीता पढ़ रहे हैं तो उसमे लिखी हर बात तर्कसंगत होगी। अगर उसमे लिखी हुई बातें तर्क विहीन हैं तो इसका मतलब है की आपको भगवद्गीता के नाम पर कुछ और ही पकड़ा दिया गया है। असली भगवद्गीता कोई अतार्किक नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि एक ऐसा ग्रन्थ है जो धर्म का ज्ञान देता है और धर्म हमेशा तर्कसंगत (Logical) होता है।
- याद रखें कि भगवद्गीता धर्म पर आधारित पुस्तक है, न कि भोग-विलास की प्राप्ति के पर। इसलिए, ईश्वर के वचनों से युक्त इस पुस्तक का वास्तविक सार जानने के लिए आपको निःस्वार्थ होना होगा, स्वार्थी नहीं। अगर आप किसी भोग की इच्छा से इसे पढ़ते हैं तो आपको इसमें तर्क नहीं मिलेगा। परन्तु अगर आप इसे अपने आप को अच्छा कर्म करने वाला मनुष्य बनाने की इच्छा से पढ़ते हैं तो आपको इसमें तर्क अवश्य मिलेगा।
- हो सकता है कि आपको पहली बार में भगवद्गीता का मर्म समझ में न आए, इसलिए आपको इसे एक बार पढ़कर छोड़ नहीं देना चाहिए। कृष्ण हमें क्या सिखाना चाहते हैं, यह जानने के लिए आपको इसे कई बार पढ़ना पड़ सकता है। मैं इसका एक अच्छा उदाहरण हूँ, मुझे भी इसे पहली बार पढ़ने पर समझ नहीं आया था और इसलिए मैंने इसे पढ़ना छोड़ दिया था। कुछ वर्षों बाद, मैंने इसे फिर से पढ़ना शुरू कर दिया, बिना यह सोचे कि इससे मुझे कुछ हासिल होगा और इस बार मुझे सब समझ आने लग गया। मैं अब भी इसे नियमित रूप से पढ़ता हूँ क्योंकि हर बार इसे पढ़ने पर मुझे कुछ नया सीखने को मिलता है।
- मैं भगवद्गीता को हिंदी, अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में पढ़ते समय संस्कृत में भी पढ़ने की सलाह देता हूँ क्योंकि इससे आपको थोड़ी संस्कृत सीखने में मदद मिल सकती है। और अगर अनुवाद में कुछ गलतियाँ की गयी हों तो उन्हें आप पकड़ पाएंगे, जिससे सही मतलब समझना आसान हो जायेगा।
- किसी भी व्यक्ति (महात्मा, संत, पंडित, अदि) के द्वारा की गयी भगवद्गीता के अर्थ की व्याख्या पर निर्भर न रहें। इसका वास्तविक अर्थ समझने के लिए अपनी बुद्धि और तर्क का प्रयोग करें।
तो, ये कुछ बिंदु हैं, जो मुझे लगता है कि भगवद्गीता के प्रत्येक विद्यार्थी को इस भग्वद्ग्रन्थ का अध्ययन करते समय ध्यान में रखने चाहिए। आइए अब हम भगवान की शिक्षाओं को जानने के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए संवाद की ओर बढ़ते हैं।







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